सर्वे रिपोर्ट : बांका में कादर जाति की घट रही आबादी
शिक्षा विभाग के एक सर्वे के मुताबिक जिला भर के 359 टोले में इस जाति की आबादी है।
(राजबंधु), बांका। जिले के जंगल और पहाड़ से सटे इलाकों में एक जाति की आबादी बसी है। काला-कलूटा और गठिला बदन। मिट्टी काटने से लेकर हर प्रकार के काम में काफी मेहनती। हर जगह यह अलग-अलग नाम से जानी जाती है। कहीं लैया-खैरा तो कहीं पुजहर और कादर से लोग इसे जानते हैं। शिक्षा विभाग के एक सर्वे के मुताबिक जिला भर के 359 टोले में इस जाति की आबादी है। इनका 90 प्रतिशत से अधिक परिवार प्लास्टिक और जंगल के झाड़ से बनी टटिया में रहता है। अब पीएम आवास योजना से कुछ को पक्का घर मिलना नसीब हो रहा है। इसे न पढ़ाई से मतलब और न ही साफ-सफाई से। आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर। इन टोलों का सबसे बड़ा सच यह है कि गांव में कोई बुजुर्ग नहीं दिखता है। एक गांव में 60 से पार आयु का इक्का-दुक्का लोग मुश्किल से दिखता है। शहर के जगतपुर और मसुरिया में इसकी बस्ती में पहुंच हम सच देख सकते हैं। जगतपुर कदरसी में चनेश्वर लैया सबसे बुजुर्ग है। इसके बाद सभी युवा है। इससे बड़ा भुटकू लैया पिछले दिनों चल बसा है। मसुरिया में कोई बुर्जूग नहीं है। बेलहर के निमियां में इस जाति का करीब 50 घर है। पर कोई बूढ़ा नहीं दिखेगा। तेतरीगढि़या नैयासी में भी कोई बुर्जूग नहीं है। यहां सबसे अधिक उमर में 50 साल का व्यक्ति है। डोमाखांड, पथरा, डाढ़ा आदि कदरसी में भी कमोबेश यही स्थिति है। कम उम्र में लोगों की मौत की वजह से आबादी भी बढ़ने के बजाय लगातार घटती जा रही है।
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आर्थिक पिछड़ापन और अशिक्षा बड़ी वजह :
लैया-खैरा और कादर में आर्थिक पिछड़ापन और अशिक्षा का बोलबाला है। लैया-खैरा संघर्ष मोर्चा के सुभाष चंद्रा कहते हैं कि इस समाज को देसी शराब ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। बीमार पड़ने पर लोग चिकित्सक के बदले देवी-देवता की पूजा करते हैं। चिकित्सक के पास नहीं जाने के पीछे भी पैसे का अभाव होता है। कुछ दवा से बीमार ठीक नहीं हुआ तो परिजन उसे छोड़ देते हैं। जिससे उसकी अनायास मौत हो जाती है। उनकी जानकारी के अनुसार हर गांव में लोग कम हो रहे हैं। इनका अधिकांश बच्चा अब भी विद्यालय से दूर है। पिछले दो दशक से इसकी आबादी 40 हजार से 35 हजार के करीब ही है।
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जेनेटिक और जागरुकता के अभाव की संभावना :
चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. मदन पाठक कहते हैं कि यह जेनेटिक भी हो सकता है। जागरुकता के अभाव में लोग साफ-सुथरा नहीं रहते हैं। इनके खान-पान में भी मछली, चिड़िया आदि मांसाहार शामिल होता है। निश्चित रूप से इसका असर उम्र पर पड़ता है। ऐसे परिवार में बच्चे भी कुपोषण के शिकार होकर बेमौत मरते हैं। वैसे इन परिवार में मौतों का अध्ययन के बाद ही इसका सही पता लग सकता है।
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