भागलपुर [दिलीप  कुमार शुक्ला]। हिंदी के बहुचर्चित कवि कैलाश झा किंकर का निधन कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण हो गया। वे अंगिका भाषा के भी कवि थे। किंकर खगडिया नगर के निवासी और वहां के सांस्कृतिक पुरोधा थे। उन्होंने अंगिका और हिंदी में कविता की कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। वे हिंदी अंगिका की पत्रिका "कौशिकी" के संपादक थे। वे अत्यंत संवेदनशील, सृजनशील और आत्मीय थे।

हिंदी और अंगिका चर्चित कवि, साहित्यकार कुशल प्रधानाध्यापक, महासचिव, अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच जिला- शाखा (खगड़िया) कोरोना पॉजिटिव होने के कारण चिकित्सीय देखरेख में थे। 13 जुलाई (सोमवार) को शाम 7:45 बजे बाथरूम से आए बिछावन पर लेटे और रात 8:00 बजे सभी छोड़ कर चल बसे। कैलाश झा किंकर नहीं रहे। 58 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ। वे चम्मन टोला, खगड़िया के प्राथमिक विद्यालय में बतौर प्रधानाध्यापक कार्यरत थे।

हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया के संस्थापक, महासचिव और कौशिकी त्रैमासिक पत्रिका के संपादक कैलाश झा किंकर के आकस्मिक निधन से खगड़िया ही नहीं पूरे देश के साहित्यकार मर्माहत हैं। उनकी तीन दशकीय साहित्यिक यात्रा के दौरान उनकी अंगिका भाषा में 5 और हिंदी में 14 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 18 वर्ष अधिवेशनों के द्वारा उन्होंने खगड़िया का नाम सम्पूर्ण देश में साहित्यिक भूमि के रूप में स्थापित किया। इन अधिवेशनों में देश के विभिन्न क्षेत्रों के साहित्यकारों को स्वर्ण और रजत पत्रों से सम्मानित किया जाता रहा।

पर्रा, बेगूसराय में जन्में कैलाश के पिता का नाम दीनानाथ झा और मां का नाम रामज्योति देवी है। पत्नी का नाम संध्या कुमारी और तीन पुत्र शंकरानंद, शशि शेखर और सुमन शेखर हैं। पोते का नाम आदित्य आनंद है। उनका पुत्र शंकरानंद भी देश के जाने माने साहित्यकार हैं।

निधन पर सूचना पर साहित्य जगत के कलमकार मर्माहत हो गए। देश के कोने-कोने से शोक संदेश जारी होने लगे। अखिल भारतीय अंगिका साहित्या कला मंच के राष्ट्रीय महामंत्री हीरा प्रसाद हरेंद्र ने कहा कि किंकर जी का जाना हिन्दी और अंगिका साहित्य के लिए एक बड़ा आघात है, जिससे उबरने में उसे काफी समय लगेगा।

अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच के प्रदेश महासचिव सुधीर कुमार प्रोग्रामर ने कहा किंकर जी मात्र व्यक्ति नहीं रह गये थे, वे एक संस्था के पर्याय हो गये थे, जिससे कितने ही साहित्यकारों को सर्जना का हवा-पानी, खाद और भोजन मिलता था। अजगवीनाथ साहित्य मंच के अध्यक्ष भावानंद सिंह प्रशांत ने कहा जीते-मरते तो सब हैं, किन्तु एक जीवंत व्यक्तित्व का उठ जाना बहुत सारे को निष्प्राण कर जाता है ।

प‍ूर्णिया के डाॅ केके चौधरी ने कहा कि साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर कैलाश झा किंकर का जन्म 1962 ई. में खगड़िया के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। मुश्किलों का सामना करते ये मैट्रिक के बाद प्राईवेट ट्यूशन पढ़ाकर आगे की पढ़ाई जारी रखी। आईटीआई में नामांकन हुआ। फिर विवाह संध्या कुमारी से हुआ। इन्होंने पढ़ाई को जारी रखते हुए प्रशिक्षण प्राप्तकर शिक्षक हुए। स्वयं एम.ए. (हिन्दी) किया और पत्नी को भी पढ़ाया।साहित्य परिषद से जुड़े, फिर हिंदी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया की स्थापना की। इनके ही कुशल संचालन में साहित्य में यह संस्था मील का पत्थर साबित हुआ। पत्र-पत्रिका के शौकीन इन्होंने बिना विज्ञापन के 'कौशिकी' (त्रैमासिक) निकाला। देश भर के रचनाकारों को लेकर 'कौशिकी'-साहित्यिक वाट्सएप ग्रुप बनाया। बारह से अधिक पुस्तकें लिखी। इन्हें शिक्षक-शिरोमणि 'किंकर' भी कहा जाता था। राज्य के तकरीबन सभी जिलों में सम्मानित ये बिहार के बाहर भी अपनी प्रतिभा का डंका बजा चुके थे। सैकड़ों सम्मान एवं पुरस्कारों से उनका घर भरा है। सौम्य व्यक्तित्व के इस महान शख्सियत के आकस्मिक निधन पर बिहार ही नहीं देशभर के उनसे जुड़े लोग मर्माहत हैं। अपने पीछे तीन पुत्र, दो पुत्रवधू और पत्नी छोड़ गये हैं। 

साहित्यकारों ने जताया शोक

श्रद्धांजलि देने वालों में प्रो डॉ मधुसूदन झा, डॉक्टर शिव नारायण, डॉ रमेश मोहन आत्मविश्वास, रंजन, गीतकार राजकुमार, डॉ बी.एन सत्यम,  त्रिलोकीनाथ दिवाकर, गौतम सुमन, मनीष कुमार गूंज, सच्चिदानंद किरण, मृदुला झा, अनिरुद्ध सिन्हा, किशन कालजयी, प्रदीप प्रभात, भगवान प्रलय, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, नंदेश निर्मल, अंजनी कुमार सुमन, दिनेश तपन, श्रमेश, संजय कुमार अविनाश, अंजनी शर्मा, राहुल शिवाय, कमरान अल्वी, माधवी चौधरी, सुजाता कुमारी, विकास सिंह गुल्टी, शिवनंदन सलिल, विजेता मुद्गलपुरी, डॉ श्याम सुंदर आर्य, डॉ राजेंद्र प्रसाद मोदी, प्रो ललित नारायण मंडल, डॉ विजय कुमार मिश्र, प्‍यारे हिंद, मो सलमान, कुणाल, नन्हे, आमोद कुमार मिश्र, कयूम अंसारी, रंजना सिंह 'अंगवणी बिहट' डॉ प्रेम प्रभाकर, रामवतार राही, अभय भारती, धीरज पंडित, प्रेमचंद्र पांडे, डॉ नूतन सिंह, अनिल कुमार, स्वराक्षरी स्वरा, अंजू दास गीतांजलि, फुल कुमार अकेला, अवधेश कुमार, डॉ मथुरा दूबे, प्रो डॉ बहादूर मिश्र, डॉ तेज नारायण कुशवाहा ने अपने संदेश में कहा- किंकर जी मरे नहीं हैं । वे हमारी स्मृति में, वे अपनी पुस्तकों में जिन्दा रहेंगे।

 

उनकी मृत्यु पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये कविताकोश के उपनिदेशक राहुल शिवाय ने कहा "किंकर भय्या का जाना एक साहित्यिक वट वृक्ष का कट जाना है, अब खगड़िया को साहित्यिक छाँव कौन देगा" आँच पत्रिका की संपादक डाॅ भावना ने कहा " कैलाश झा किंकर अपने उदार व्यक्तित्व और साहित्यिक शिक्षक के रूप में हमेशा याद किये जायेंगे।" अंगिका साहित्यकार व आलोचक अनिल कुमार झा ने कहा "अब कौन मनसा वाचा कर्मणा जय साहित्य कह मिलेगा", वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ संजय पंकज ने कहा "कैलाश झा किंकर ने जो साहित्य पताका फहरायी है वह युग-युग तक उन्हें अमर रखेगी", वरिष्ठ साहित्यकार हरिनारायण सिंह हरि ने कहा "हिंदी और अंगिका साहित्य के लिये किंकर जी का जाना एक बड़ा आघात है जिससे उबरने में उन्हें बहुत समय लगेगा, बैंगलोर की गीतकार गरिमा सक्सेना ने कहा कैलाश झा किंकर जी ने जिस प्रकार सम्पूर्ण देश के साहित्यकारों को जिस अपनत्व के साथ कौशिकी के मंच से जोड़ा और साहित्य के विकास का उपक्रम किया वैसा किसी और के लिये संभव नहीं। कैलाश झा किंकर को वरिष्ठ ग़ज़लकार अनिरुद्ध सिन्हा, दीक्षित दनकौरी, ध्रुव गुप्त, अशोक मिजाज, गीतकार शिवनंदन सलिल, अवनीश त्रिपाठी, डाॅ अमरेन्द्र आदि ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

लखन लाल आरोही ने कहा कि उनके आमंत्रण पर उन्होंने खगडिया में साहित्य परिषद के दो महाअधिवेशनों का उदघाटन भी किया था। उनके निधन से हिंदी, विशेषकर अंगिका रचनात्मकता की अपूरणीय क्षति हुई है। साहित्यकारों ने उनके शोकसंतप्त परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदना व्यक्त की है।

डाॅ. अमरेंद्र ने कहा कि कैलाश झा किंकर अंगिका के एक कवि भर नहीं थे, वह इस भाषा के ऐसे कवि थे, जो कविता को सिर्फ भाव की दृष्टि से ही नहीं, शिल्प से भी समृद्ध कर रहे थे। वे अभाव में भाव के कवि थे, वे समकालीन थे और उनकी दृष्टि काल से आगे भी जाती थी। अंगिका कविता में यथार्थ और आदर्श का सुंदर संयोग कहीं दिखता है, तो कैलाश झा किंकर की कविताओं में। उनका असामयिक निधन दशकों तक अंगिका साहित्य को दहलायेगा।

साहित्‍यकार और कवियित्री निक्की शर्मा 'रश्मि' ने कहा कि कैलाश झा किंकर के निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उन्‍होंने पितातुल्य अभिभावक खो दिया है। साहित्यिक जगत ने वे एक अनमोल हीरा थे। उनकी कमी हमेशा रहेगी। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। मन व्यथित है। उन्होंने कई मौकों पर मेरा मार्गदर्शन किया है। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां-जत्ते चले चलैने जा, ओकरा कोय सनकैनें छै, जानै जौ कि जानै जाता,भेलै केहन ससुराबकलेल, दीवाली जैसी कृति सभी के दिलों में आज भी बसी है।

"अंगिका.कॉम के प्रणेता इंजीनियर कुंदन अमिताभ सहित वेब परिवार के तरफ से अंगिका के अमर योद्धा अपना सब के बीच जिंदा रही क अंग देश आरू अंगिका के सेवा लेली प्रेरणा के स्त्रोत बनलौ रहतै। हुनको असामयिक जाना पीड़ादायक छै। पतियाना मुश्किल छै। अंगिका भाषा केरौ सबसँ मजगूत स्तंभ मँ स एक किंकर जी के कमी हमेशा ही खलतै रहतै ।"

अंगिका विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.मधुसूदन झा ने कहा कि कैलाश झा किंकर जी के आकस्मिक और असामयिक निधन से अंगिका की अपूरणीय क्षति हुई। वे उत्तरांगी के बहुत बड़े स्थंभ थे। इनके चले जाने से अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच मर्माहत है।

आकाशवाणी भागलपुर के वरीय उद्घोषक डॉ विजय कुमार मिश्र 'विरजू भाई' ने कहा कि सहित्य जगत से एक मुस्‍कुराते हुए चेहरे का अचानक ओझल हो जाना मर्माहत कर गया।

गौतम सुमन ने कहा कि कैलाश झा किंकर एक ऐसे सच्चे साहित्य साधक और साहित्य सेवक थे, जिनके यूं चले जाने से अंगमहाजनपद के साहित्य जगत का कोना- कोना सूना हो गया, या यूं कह लें कि अंग प्रदेश के वर्तमान साहित्य जगत का एक अध्याय समाप्त हो गया। उन्होंने हमेशा ही लोगों को मंच दिया। 

दिनेश बाबा तपन ने कहा कि हिंदी और अंगिका के लोकप्रिय साहित्यकार कवि कैलाश झा किंकर  का निधन अंग अंगिका के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

शतदल मंजरी ने कहा कि कैलाश झा "किंकर" का होना कुछ अधिक शिद्दत से मुझे तब महसूस हुआ जब वे अपनी कभी न लौटने वाली आखिरी यात्रा पर निकल गए। 

माधवी चौधरी ने एक एक कविता के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी है -  किंकर भैया... अंकित रहेंगे सबके हृदय में... कभी कविता, कभी किसी प्रसंग में... वात्सल्य कभी, कभी स्नेह बंधन में... दीप्त रहेंगे मानस पटल में... कभी नवोदित के उत्कर्ष में... और वरीष्ठ के संस्मरण में।

अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच के कार्यकारी अध्यक्ष गीतकार राजकुमार ने कहा कि  कवि कैलाश झा किंकर  का निधन अत्यंत ही दुखद समाचार है। इनके घर लौटने की सूचना तो मिली थी। फिर यह अचानक क्या सुन रहा हूं। विश्वास नहीं हो पा रहा है कि कैलाश झा किंकर अब नहीं रहे। इनके अचानक चले जाने से  साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है, जिसकी पूर्ति कतई संभव नहीं है।ईश्वर इनकी विदेही आत्मा को अपनी शरणागति और इनके संपूर्ण विस्तृत परिवार को इस असह्य कष्ट को सहन करने की क्षमता प्रदान करें। !!ॐ शांति: ॐ शांति: ॐ शांति:!!

Posted By: Dilip Shukla

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