उफनती गंगा में अठखेलियां कर रहीं डॉल्फिन! 27 साल में 95 से 215 पहुंचा कुनबा; राष्ट्रीय दिवस पर भागलपुर से सुखद तस्वीर
National Ganga Dolphin Day:भागलपुर में गंगा का जलस्तर बढ़ने के बावजूद डॉल्फिन शहरी घाटों के पास अठखेलियां कर रही हैं, ...और पढ़ें

National Ganga Dolphin Day:
HighLights
भागलपुर में गंगा के ऊंचे जलस्तर पर डॉल्फिन का रोमांचक दीदार।
27 वर्षों में डॉल्फिन की संख्या 95 से बढ़कर 215 हुई।
शोर, प्रदूषण और जालों से डॉल्फिन के प्राकृतिक आवास को खतरा।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। National Ganga Dolphin Day: गंगा का जलस्तर खतरे के निशान के करीब उफान पर है और बहाव की गति अत्यंत तीव्र है। विक्रमशिला सेतु पर आवागमन बंद होने के चलते इन दिनों नदी में फेरी जहाजों की आवाजाही भी बढ़ गई है।
जहाज पर सवार मुसाफिरों की नजरें जैसे ही गंगा की लहरों पर टिकती हैं, वैसे ही पानी से सिर उभारकर कलाबाजी खाती 'सोंस' (गांगेय डॉल्फिन) का दीदार लोगों को रोमांचित कर देता है। जिस गंगा का उफान भागलपुर शहर के लिए चुनौती बना हुआ है, उसी के आंचल में आज सोंस का भरा-पूरा संसार खिलखिला रहा है।
बाढ़ और तेज जलधारा के दबाव से बचने तथा शांत पानी की तलाश में कई डॉल्फिन इन दिनों बरारी, बूढ़ानाथ और बाबूपुर जैसे शहरी घाटों के एकदम मुहाने तक पहुंच गई हैं। पांच अक्टूबर को मनाए जाने वाले 'राष्ट्रीय गंगा नदी डॉल्फिन दिवस' के अवसर पर भागलपुर का यह नजारा पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से बेहद सकारात्मक संदेश दे रहा है।
27 वर्षों में दोगुनी से अधिक हुई तादाद
गंगा में डॉल्फिन का यह कुनबा पिछले पौने तीन दशकों में तेजी से फला-फूला है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1998 में सुल्तानगंज के अजगैवीनाथधाम से कटिहार के मनिहारी के बीच गंगा की धारा में महज 95 डॉल्फिन का आकलन किया गया था। लेकिन संरक्षण के निरंतर प्रयासों, निगरानी और जागरूकता अभियानों के चलते हालिया आंकड़ों में इनकी संख्या बढ़कर करीब 215 तक पहुंच गई है।
कुनबे में 12 बच्चे भी दिखे
उल्लेखनीय है कि 7 अगस्त 1991 को अधिसूचित विक्रमशिला गांगेटिक डॉल्फिन अभयारण्य सुल्तानगंज से कहलगांव के बीच गंगा की करीब 60 किलोमीटर लंबी जलधारा में विस्तृत है। अकेले इस अभयारण्य क्षेत्र में ही करीब 200 डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज की गई है।
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वर्ष 2022 में कराए गए सर्वे में भी अभयारण्य क्षेत्र में इनकी संख्या 188 से बढ़कर 208 दर्ज की गई थी, जिसमें 12 नन्हे बच्चे (शावक) भी अठखेलियां करते पाए गए थे। नदी में प्रतिबंधित महीन जालों के खिलाफ नियमित कार्रवाई और मछुआरों के बीच बढ़ी जागरूकता इस वृद्धि की मुख्य वजह बनी है।
गंगा की सेहत और शोर-शराबे से प्राकृतिक आवास को चुनौती
नदियों और पर्यावरण पर काम करने वाले विशेषज्ञ दीपक कुमार बताते हैं कि सोंस की संख्या में यह वृद्धि सुखद है, लेकिन गंगा की सेहत से जुड़ी गंभीर चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। उन्होंने बताया कि भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव 'गांगेय डॉल्फिन' लगभग दृष्टिहीन होती है। यह पानी के भीतर अपना रास्ता तलाशने और शिकार करने के लिए पूरी तरह ध्वनि तरंगों (इकोलोकेशन) पर निर्भर करती है।
ऐसे में वर्तमान समय में जहाजों और मोटराइज्ड बोटों की तेज आवाज, बढ़ता जल प्रदूषण, मछली पकड़ने के नायलॉन जाल और जलप्रवाह में बदलाव इसके प्राकृतिक आवास के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। डॉल्फिन के बेहतर भविष्य के लिए नदी में शोर और मानवीय दखल को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है।
"पांच अक्टूबर के 'राष्ट्रीय गंगा नदी डॉल्फिन दिवस' पर भागलपुर से सामने आई यह तस्वीर पूरे देश के लिए एक सुखद और सकारात्मक संदेश देती है। गंगा में डॉल्फिन का लगातार बढ़ता कुनबा वन विभाग, स्थानीय मछुआरों और पर्यावरण प्रेमियों के संयुक्त संरक्षण प्रयासों का सार्थक परिणाम है।"
