जागरण संवाददाता, भागलपुर। चंपानगर के ऐतिहासिक मनसा मंदिर में बारी कलश पूजन के साथ एक माह तक होने वाली बिहुला विषहरी पूजा (Bihula Wishhari worship) का आगाज कर दिया जाएगा। चंपानगर के कुंवरसरी में पिछले एक सप्ताह से कुम्हार देवानंद द्वारा मिट्टी से बारी कलश को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कच्ची मिट्टी को बिना आग में पकाए रंग रोगन होगा। कलश पर फन फैलाए विषहरी बहन का प्रतीक चिन्ह हैे।

16 जुलाई को मंदिर में बारी कलश स्थापित करने के बाद इसकी शुरू होगी। मनसा मंदिर भक्तों और भजन मंडली द्वारा बिहुला विषहरी के गीतों से 17 अगस्त तक गुंजायमान होगा। कलश को शोभा यात्रा निकालकर गंगा घाट लाया जाएगा। यहां से भी मंदिर में स्थापित की जाएगी।

कुम्हारों के घर पर बारी कलश को विशेष तौर तैयार किया जाता है। वर्ष 1980 से देवानंद बारी कलश तैयार करते हैं। 15 जुलाई को चंपानगर विषहरी मंदिर के पंडा कुम्हार के घर बारी कलश के पूजन के लिए पहुंचेंगे। यहां चना, खीरा, पेडा, अमरूद आदि फल फुल के साथ पूजन होगा। धूप, गंध व धुमना आदि से मनसा देवी का आह्वान होगा। यहां से दीप जलाकर मंदिर के पंडा विषहरी मंदिर लेकर जाएंगे।

देर राम तक पूजन के उपरांत 16 जुलाई की सुबह मंदिर में पीतल के कलश का पूजन होगा और डलिया आदि चढ़ाया जाएगा। यह सिलसिला दोपहर से शाम चार बजे तक चलता रहेगा। वहीं शाम पांच बजे कुम्हार देवानंद के घर मंदिर के पंडा ढोल-बाजे के साथ पहुंचेंगे।

यहां पूजा-अर्चना कर कलश के साथ शोभा यात्रा निकाली जाएगी। जो तांती बाजार स्थित पथरनाथ घाट पर बारी कलश के साथ विशेष पूजन होगा। इसके उपरांत मंदिर में विधि-विधान के साथ कलश स्थापित किया जाएगा। इसके बाद नियमित 17 अगस्त तक विषहरी मंदिर में कलश पूजन का सिलसिला शुरू होगा। वहीं कलश स्थापना के साथ 16 जुलाई को प्रतिमा निर्माण की नींव रखी जाएगी। 15 को कुम्हार के घर पूजन होगा।

अंग प्रदेश का लोक पर्व मनसा विषहरी पूजा

  • बारी कलश का यह है महत्व

बाला लखेंद्र के पिता व सती बिहुला के ससुर चंद्रधर सौदागार भगवान भोलेनाथ की बात सुनकर मनसा देवी को पूजा देने को राजी हुए। चंद्रधर ने पूजन के लिए कलश स्थापित किया। इस दौरान स्वर्ग लोक से जया विषहरी, दुतिला विषहरी, पद्मा कुमारी, आदिकसुमिन व मैना विषहरी वहां पहुंच गईं। कलश पर पांचों बहन विषहरीकलश पर विराजमान हो गई। कुम्हार देवानंद ने बताया कि इसलिए प्रतीक के रूप में कलश पर पांचों बहन विषहरी की आकृति बनाई जाती है। चंद्रधर सौदागर द्वारा पूजन की परंपरा आज भी जारी है।

बिहुला विषहरी की कहानी

अंग प्रदेश के चंपानगर की बिहुला विषहरी कहानी पौराणिक मान्यताओं से परिपूर्ण है। इसके तथ्य विक्रमशिला के अवशेषों में भी मिलते हैं। चंद्रधर सौदागर चंपानगर के एक बड़े व्यवसायी थे। वे एक परम शिवभक्त भी थे। विषहरी जो भगवान शिव की पुत्री कही जाती हैं ने चंद्रधर पर दबाव बनाया कि वे शिव की पूजा न कर किसी और की पूजा करें।

लेकिन चंद्रधर राजी नहीं हुए। इसके बाद आक्रोशित विषहरी ने सौदागर के पूरे परिवार को खत्म करना शुरी कर दिया। सौदागर के छोटे बेटे जिनका नाम बाला लखेंद्र था की शादी बिहुला से हुई थी। उसके प्राण की रक्षा के लिए सौदागर ने लोहे-बांस से एक घर बनाया ताकि उसमें एक भी छिद्र न रहें। विषहरी ने उसमें भी प्रवेश कर लखेन्द्र को डस लिया।

सती हुई बिहुला अपने पति के शव को केले के थम से बने नाव में लेकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक तक चली गई। इसके बाद वो पति का प्राण वापस लेकर लौटी। सौदागर भी विषहरी की पूजा के लिए राजी हुए लेकिन बाएं हाथ से तब से आज तक विषहरी पूजा में बाएं हाथ से ही पूजा होती है। बता दें कि सौदागर का बेटे के लिए बनाया हुआ घऱ आज भी चंपानगर में स्थित है।

Edited By: Shivam Bajpai