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भागलपुर में दुर्गा पूजा की अनोखी परंपरा, कभी मंसूरगंज से आती थी पुण्य माटी, अब सोनागाछी से जुड़ा है नाता

Published: Tue, 13 Oct 2026 09:33 PM (IST)

भागलपुर में दुर्गा पूजा की एक अनोखी परंपरा रही है, जहाँ मूर्तियों के लिए पहले मंसूरगंज की 'पुण्य माटी' का ...और पढ़ें

एआई से निर्मित सांकेतिक तस्वीर।

एआई से निर्मित सांकेतिक तस्वीर।

HighLights

  1. भागलपुर में दुर्गा पूजा के लिए मिट्टी की अनूठी परंपरा।

  2. पहले मंसूरगंज की 'पुण्य माटी' का होता था उपयोग।

  3. अब यह परंपरा कोलकाता के सोनागाछी से जुड़ी है।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। कभी जिस गली को समाज की नजरें तिरस्कार और उपेक्षा से देखती थीं, शारदीय नवरात्र की सुगबुगाहट शुरू होते ही उसी मंसूरगंज की चौखट पर आस्था सिर झुकाती थी।

गंगा स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण किए पंडित, पूजा समितियों के मेढ़पति और मूर्तिकार मंत्रोच्चार व शंखनाद के बीच मंसूरगंज पहुंचते थे। वहां मां दुर्गा की प्रतिमा को पूर्णता देने और पूजा के विधान को पूरा करने के लिए नगरवधुओं के आंगन की मिट्टी मांगी जाती थी।

समाज में उपेक्षित रहने वाली महिलाएं भी पूरे श्रद्धा भाव से मिट्टी दान करती थीं।भागलपुर की इस पुरानी परंपरा में आस्था का ऐसा सुंदर रंग घुला था, जो सामाजिक भेदभाव के बीच भी देवी के दरबार में हर वर्ग की भागीदारी का संदेश देता था।

मंसूरगंज से मिट्टी ले जाने की समृद्ध विरासत

केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति के संरक्षक और स्थानीय समाजसेवी कमल जायसवाल बताते हैं कि मंसूरगंज से मिट्टी ले जाने की परंपरा यहां वर्षों से विरासत के रूप में चली आ रही थी। दुर्गा पूजा के दौरान शहर के कई प्रमुख पूजा पंडालों की समितियां यहां से मिट्टी लेने पहुंचती थीं।

उस दौर में यह मुहल्ला केवल अपनी पुरानी पहचान के लिए ही नहीं, बल्कि दुर्गोत्सव से जुड़े एक महत्वपूर्ण और पवित्र धार्मिक विश्वास के लिए भी जाना जाता था। हालांकि, समय बदलने के साथ अब यहां नगरवधुओं का पुराना ठिकाना नहीं रहा और स्थानीय स्तर पर मिट्टी लाने की यह परंपरा भी इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।

'पुण्य माटी' की धार्मिक मान्यता और लोकविश्वास

बंगाली पद्धति से होने वाली दुर्गा पूजा में वेश्यालय की चौखट की मिट्टी को ‘पुण्य माटी’ कहे जाने की गहरी लोकपरंपरा है। इसके पीछे एक प्रचलित मान्यता यह है कि वहां प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने सारे पुण्य उस चौखट पर ही छोड़ देता है।

इसलिए उस स्थान की मिट्टी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। दूसरी सामाजिक व्याख्या इसे समाज से उपेक्षित महिलाओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक मुख्यधारा में स्थान और सम्मान देने का एक सशक्त प्रतीक मानती है।

स्वामी विवेकानंद पथ के रूप में नई पहचान

स्थानीय इतिहास के अनुसार, मंसूरगंज का इलाका कभी नृत्य-संगीत की महफिलों और तवायफों की कलात्मक साधना के लिए भी जाना जाता था। कालचक्र के साथ इसकी पुरानी सांस्कृतिक पहचान धुंधली हो गई और आज यह इलाका 'स्वामी विवेकानंद पथ' के नाम से जाना जाता है।

अब कोलकाता के सोनागाछी से जुड़ गई परंपरा

भागलपुर कालीबाड़ी के सचिव विलास बागची के अनुसार, पूर्व में जब मंसूरगंज में नगरवधुओं की बसावट थी, तब वहीं से मिट्टी लाई जाती थी। लेकिन अब वहां का परिवेश बदल जाने के कारण भागलपुर में बंगाली परंपरा से होने वाली पूजा के लिए कोलकाता के प्रसिद्ध 'सोनागाछी' से मिट्टी मंगाने की प्रथा शुरू हो गई है।

बदलते शहर और सामाजिक सोच का आईना

मंसूरगंज की यह स्मृति केवल मिट्टी लाने की एक कहानी भर नहीं है, बल्कि यह बदलते शहर, समय के बदलाव और समाज के नजरिये का एक महत्वपूर्ण आईना भी है। यह परंपरा याद दिलाती है कि मां दुर्गा की पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक उसमें समाज के अंतिम और उपेक्षित व्यक्ति का योगदान शामिल न हो।

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