भागलपुर में महिलाएं एक-दूसरे को लगाती हैं सिंदूर, नम आंखों से होती है मां दुर्गा की मायके से विदाई
भागलपुर की दुर्गापूजा में खोईछा, सिंदूर खेला और कोहड़ा अर्पण जैसी अनूठी परंपराएं देखने को मिलती हैं। ये रस्में धार्मिक विश्वास, सामाजिक जुड़ाव और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

सांकेतिक तस्वीर
HighLights
मोहदीनगर में मां कल्याणी को कोहड़ा अर्पण की परंपरा।
मंदरोजा में महिलाएं भरती हैं सुहाग के लिए खोईछा।
विजयादशमी पर बंगाली समाज में सिंदूर खेला का उल्लास।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। मां दुर्गा के दरबार में आस्था के रंग अनेक हैं। कहीं ढाक की थाप पर देवी का आह्वान होता है, कहीं सुहाग की लंबी उम्र की कामना के साथ महिलाएं मां की गोद में खोईछा भरती हैं, तो कहीं सिंदूर की लालिमा के बीच नम आंखों से मां को विदाई दी जाती है।
भागलपुर की दुर्गापूजा की खूबसूरती केवल भव्य पंडालों और आकर्षक प्रतिमाओं में नहीं, बल्कि उन परंपराओं में भी बसती है, जिन्हें पीढ़ियां सहेजती आई हैं।
मोहदीनगर की मां कल्याणी के दरबार में कोहड़ा अर्पित करने की परंपरा हो या मंदरोजा में खोईछा भरने के लिए महिलाओं की लंबी कतार, हर रस्म अपने भीतर धार्मिक विश्वास और सामाजिक जुड़ाव की कहानी समेटे है। यही विविधता अंग की धरती पर दुर्गोत्सव को विशिष्ट पहचान देती आ रही है।
कोहड़ा अर्पित कर मां कल्याणी से मन्नत
मोहदीनगर दुर्गा स्थान में मां कल्याणी के प्रति श्रद्धा के साथ पशु बलि के स्थान पर कोहड़ा अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। यहां श्रद्धालु प्रतीकात्मक रूप से कोहड़ा चढ़ाकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
धार्मिक परंपराओं में प्रतीकात्मक अर्पण का विशेष महत्व रहा है। मां कल्याणी के दरबार में पूजा के दौरान स्थानीय लोगों की भागीदारी मंदिर को धार्मिक स्थल के साथ सामाजिक मेल-मिलाप का केंद्र भी बनाती है।
खोईछा में सुहाग की कामना, मां से भावनात्मक रिश्ता
मंदरोजा दुर्गा स्थान में महाष्टमी की सुबह से खोईछा भरने के लिए महिलाएं मां दुर्गा को सुहाग की सामग्री, चुनरी, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने के लिए कतारबद्ध दिखीं। इसे सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य और परिवार की मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।
सिंदूर खेला में विदाई का उल्लास और विरह
बंगाली समाज की दुर्गापूजा में विजयादशमी पर सिंदूर खेला का विशेष महत्व है। महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरी सुहागिन महिलाओं को सिंदूर लगाकर मंगलकामना करती हैं। इसके बाद मां को विदाई दी जाती है।
इस रस्म में उत्सव और विरह दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं। मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा मायके आई बेटी की तरह कुछ दिन भक्तों के बीच रहती हैं और फिर अपने धाम लौट जाती हैं।
सिंदूर खेला इसी आत्मीय संबंध का प्रतीक है। भागलपुर के बंगाली पूजा स्थलों में यह परंपरा सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती है।
रेलवे परिसर से महासमिति तक, परंपरा के साथ संगठन
भागलपुर रेलवे परिसर में वर्ष 1966 से दुर्गापूजा की परंपरा कायम है। समय के साथ पूजा का स्वरूप बदला, लेकिन आयोजन के प्रति लोगों की भागीदारी बनी रही।
वहीं, दुर्गापूजा केंद्रीय महासमिति वर्ष 1987 से विभिन्न पूजा समितियों के बीच समन्वय और विसर्जन व्यवस्था में भूमिका निभा रही है। अलग-अलग मोहल्लों और समुदायों की समितियों को एक सूत्र में जोड़ने का यह प्रयास पर्व को व्यवस्थित और सामूहिक स्वरूप देता है।
खिचड़ी भोग से विविध पकवान तक, साझा होता प्रसाद
भागलपुर की दुर्गापूजा में भोग की परंपरा भी विशेष है। कई पूजा स्थलों पर खिचड़ी, सब्जी और अन्य पारंपरिक व्यंजन प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं, जबकि कुछ स्थानों पर अलग-अलग पकवानों का भोग लगाया जाता है।
प्रसाद ग्रहण करने के लिए लोग एक साथ बैठते हैं। इसमें जाति, वर्ग और समुदाय की दीवारें पीछे छूट जाती हैं। पूजा पंडाल इस तरह केवल दर्शन का स्थान नहीं रहते, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सामूहिक सहभागिता के केंद्र बन जाते हैं।
