भागलपुर, जेएनएन। आस्था का अमूल्य धरोहर है बाबा बूढ़ानाथ मंदिर। इसकी गौरव गाथा अति प्राचीन है। अंग कर धरती पर पतित पावनी गंगा के किनारे अवस्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की नजर में विश्वविख्यात है।

मंदिर का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बक्सर से ताड़का सुर का वध करने के बाद वशिष्ठ मुनी अपने शिष्य राम और लक्ष्मण के साथ भागलपुर आए थे। उसी समय त्रेता युग में उन्होंने बाबा बूढ़ानाथ मंदिर की स्थापना कर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी। शिव पुराण के द्वादश अध्याय में भी इस बात का उल्लेख है। इसी मंदिर के नाम से ही यहां के मोहल्ले का भी बूढ़ानाथ है।

पहले बाल वृद्ध के नाम से भी था प्रचलित

महाशिवपुराण के चतुर्थ कोटि रुद्र संहिता द्वितीय अध्याय में इन्हें काशी नामक शिवपुरी स्थित गंगा तट कृति बासेश्वर जैसे शिवलिंग की आभा स्वरूप ही स्थापित बताया गया है। जिसके स्वरूप बालवृद्ध है। बालवृद्ध का ही नाम कालांतर में वृद्धेश्वरनाथ और बूढ़ानाथ हो गया। गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ के राजगुरु थे। गुरु वशिष्ठ का चंपापुरी के निकटवर्ती गंगा पर पड़ाव आश्रम रहा था। इसी दौरान उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की थी।

मंदिर में है कई प्राचीन मूर्तियां

इस मंदिर में भगवान शंकर, माता पार्वती एवं शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा आदि की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। इतिहासकारों की माने तो यहां शिव-पार्वती का पूजा अर्चना करने स्वतंत्रता सेनानी तिलकामांझी भी आते थे।

यह अंग क्षेत्र का अति प्राचीन मंदिर है। विश्व प्रसिद्व इस मंदिर में दूर दराज से यहां लोग पूजा अर्चना को आते हैं। बाबा के दरबार में यहां सबकी मुरादें पूरी होती है। - महंत शिव नारायण गिरि

Posted By: Dilip Shukla

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