सती नगरी लारी का है एतिहासिक महत्व
भारत प्रारंभ से ही विविधताओं का देश रहा है।
जागरण विशेष
अजीत कुमार,कुर्था,अरवल
भारत प्रारंभ से ही विविधताओं का देश रहा है। अनेक धर्मों, पैगंबरों, संतो व तपस्वीयों का जन्म स्थली का यह देश हमेशा से कई अद्भूत इबादत लिखता रहा है। मतों में मतांतर होते हुए भी सभी का लक्ष्य परम तत्व की प्राप्ति ही है। भारतीय संस्कृति में सती प्रथा के संबंध में कुछ ऐसी ही घटना हुई है। हालांकि सन 1829 में लार्ड विलियम बे¨टग ने सती प्रथा पर रोक लगाने के लिए कड़ा कानून बनाया था। फिर भी सती होने वाली नारियां उस कानून का कोई परवाह नहीं करती थी। उसके अंदर पति परमेश्वर के लिए समर्पण की भावना कूट कूटकर भरी रहती थी। सती होने में उसे तनिक भी हिचक नहीं होता था। इन्हीं तथ्यों के बीच इतिहास के पन्नों में अपना स्थान रखने वाली प्रखंड क्षेत्र के लारी गांव में 24 जनवरी 1986 को वसंत पंचमी के दिन सोनामती ने खुद को सती में नाम दर्ज करवाई थी। उस दिन सुबह गांव के श्मशान घाट पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा कि एक महिला सती होने वाली है। यह बात आग की तरह फैल गई। कुछ तो श्रद्धावश तो कुछ कौतुहलवस इस घटना को देखने के लिए पहुंचे थे। इसी बीच एक नव युवती नए वस्त्रों, श्रृंगारों के सारे अलंकारों से सुसज्जित अपने पति के शव को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। वह अपनी आभायुक्त और प्रसन्नचित चेहरे से उपस्थित लोगों को आकर्षित कर रही थी। लोग इस दृश्य को देख आश्चर्यचकित थे। इसी बीच एक चमत्कार हुआ और नारी के बाएं पैर के अंगूठे से आग जैसी लपटें उठती हुई धीरे-धीरे उसके पति के शव को जलाते हुए आगे बढ़ रही थी। दैविक चमत्कार ही था कि वह सती नारी लोगों से बात भी कर रही थी। सती सोनामती वर्तमान जहानाबाद जिले के शकुराबाद थाना क्षेत्र के नौगढ़ गांव के रामचरण ¨सह की पुत्री थी। उनका विवाह मात्र 16 साल की उम्र में अरवल जिले के लारी गांव के वसंत ¨सह के पुत्र नवाब ¨सह के साथ हुआ था। शादी के बाद जब वह ससुराल आई थी तो विष्णु स्वरूप अपने पति का चरण धोकर पान किया करती थी। जब वह मायके जाने लगी तो भी अपने पति का चरण धोकर अपने साथ लेकर गई थी। मायके में रहने के दौरान ही उनके पति का निधन हो गया था। वह लारी आई और अपने मृत पति का चरण छूकर प्रणाम कर अपने कमरे में चली गई। जहां वह सजने् लगी। साथ ही घर वालों से कहने लगी कि वह भी अपने पति के साथ सती होगी। हालांकि लोगों ने उसे ऐसा करने से काफी रोका। हालांकि चिता में बार-बार आग लगाने का प्रयास करने पर भी आग नहीं लगने पर सोनामति के आग्रह को स्वीकार किया गया। ज्योंहि वह अपने पति के शव को लेकर चिता पर बैठी कि उसके बाएं पैर के अंगूठे से अपने आप आग निकलने लगी और चिता धधक उठा। इस बात की सूचना पाकर तत्कालीन गया जिले के जिलाधिकारी जार्ज ग्रियसन पुलिस फोर्स के साथ लारी गांव पहुंचे और ग्रामीणों की गिरफ्तारी करने लगे। ग्रामीणों ने स्वयं सती होने की बात कही। इस दौरान उनका बेटा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। इस बीच डीएम की पत्नी ने स्वप्न देखा। स्वप्न में सती नारी ने उनसे कहा कि यदि आपके पति द्वारा मेरे गांव के लोगों को परेशान किया गया तो आपके परिवार का भला नहीं होगा। स्वप्न देखते ही उन्होंने अपने डीएम पति को कार्रवाई करने से रोका। फिर क्या था सती का चमत्कार हुआ कि उनका बेटा स्वस्थ्य हो गया। जिससे जिलाधिकारी भी प्रभावित हो गए। इस सती के नाम पर 1987-88 में भव्य मंदिर का निर्माण भी यहां किया गया है।
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