यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 27, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अरुण कुमार पर फूटा दंगों का ठीकरा
लखनऊ। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद अब सूबे में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर अफरातफरी है। प्रशासन सरक

लखनऊ। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद अब सूबे में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर अफरातफरी है। प्रशासन सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने लगा है, जबकि शासन ने दंगों का ठीकरा एडीजी (कानून व्यवस्था) अरुण कुमार पर फोड़ते हुए उन्हें डीजीपी कार्यालय से संबद्ध कर दिया। मुकुल गोयल को नया एडीजी (कानून व्यवस्था) बनाया गया है। उधर मुजफ्फरनगर के एसएसपी प्रवीण कुमार ने दंगे की बुनियाद समझे जाने वाले 'कवाल कांड' की सीबीआइ जांच की सिफारिश कर आग में घी का काम किया है।
सरकार ने गुरुवार दोपहर अचानक एडीजी कानून व्यवस्था अरुण कुमार को हटाते हुए 1987 बैच के आइपीएस मुकुल गोयल को नियुक्त करने का फैसला लिया। बताया जा रहा है कि दंगे फैलने के बाद शासन ने अरुण कुमार को मुजफ्फरनगर भेजा था फिर भी स्थिति नियंत्रित नहीं हुई। इसी बीच अरुण कुमार ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए प्रार्थना पत्र पर कार्रवाई के लिए डीजीपी को स्मरण पत्र लिखा और फिर अवकाश पर चले गए। चर्चा आम हुई कि दंगों के दौरान पुलिस को कार्रवाई करने की पूरी छूट न मिलने से नाराज होकर एडीजी अवकाश पर गए। तब एडीजी ने धार्मिक यात्रा पर जाने की बात कहकर चर्चाओं को विराम देने का प्रयास किया। उनके लौटने के दो दिनों के अन्दर ही सरकार ने उन्हें एडीजी कानून व्यवस्था के पद से हटा दिया उनके स्थान पर मुकुल गोयल को नियुक्त किया। मुकुल गोयल अभी तक अपर पुलिस महानिदेशक रेलवे के पद पर तैनात थे। डेढ़ वर्ष की सरकार में इस पद पर नियुक्त होने वाले वह तीसरे आइपीएस हैं।
इसी बीच मुजफ्फरनगर के एसएसपी प्रवीण कुमार के पत्र ने हड़कंप मचा दिया। उन्होंने लिखा कि मुजफ्फरनगर में उपद्रव बेकाबू होने पर प्रदेश सरकार ने वहां बतौर एसएसपी नियुक्त किया। उस समय वह आंख की बीमारी से परेशान थे। कुछ आरोपियों पर लगी धाराएं घटायी गयीं। दबाव के चलते प्रवीण कुमार की श्वांस की बीमारी भी उभरी और वह इलाज के लिए एम्स रवाना हो गए। पुलिस महानिदेशक देवराज नागर ने स्वीकार किया है कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी ने 27 अगस्त को कवाल में हुए हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने की सिफारिश की है।
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विदाई के कई तर्क
अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) कानून व्यवस्था के पद से अरुण कुमार की विदाई में कई रहस्य हैं। आइपीएस का एक तबका उनके तबादले की वजह 'खराब प्रदर्शन' मान रहा जबकि दूसरा इसके पीछे राजनीतिक निहितार्थ देख रहा है। सपा की सरकार बनने के बाद जगमोहन यादव को एडीजी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। कुछ माह के अन्दर ही उन्हें हटाकर तकनीकी सेवा में कार्य कर रहे अरुण कुमार को एडीजी कानून व्यवस्था का जिम्मा सौंप दिया गया। कहा जाता है कि काम संभालते ही उन्होंने गोण्डा में एक स्टिंग आपरेशन कराया, जिसमें दर्जा प्राप्त मंत्री की संलिप्तता सामने आयी। आरोपित के स्थान पर वहां के एसपी के खिलाफ कार्रवाई हो गई, ऐसे ही अलीगढ़ में आरआई के साथ मारपीट में नाम प्रकाश में आने के बाद सपा नेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। मुजफ्फरनगर के एसएसपी सुभाष दुबे के खिलाफ कार्रवाई भी उनकी मंशा के विपरीत हुई बतायी गयी.. जिससे वह बेचैन थे। सूत्रों का कहना है कि इन्हीं कारणों से उन्होंने केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने का पत्र लिखा था जिससे सरकार उनसे नाराज हो गयी। इस तर्क से इतर, आइपीएस के ही दूसरे तबके का मानना है कि अरुण कुमार के एडीजी रहते ही डिप्टी एसपी, एक थानाध्यक्ष की हत्या, मुजफ्फरनगर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर सांप्रदायिक उपद्रव हुए। अपराध बढ़ गए। जिसे रोकने में नाकामी पर ही अरुण की विदाई हुई।
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भाजपा विधायक सुरेश राणा समेत 18 पर रासुका
मुजफ्फरनगर दंगों के आरोप में सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम के बाद भाजपा विधायक सुरेश राणा को भी रासुका में निरुद्ध कर दिया गया है। राणा शामली के थानाभवन से विधायक हैं। इसके अलावा 17 और पर रासुका लगाया गया है। जिसमें मुकर्रम कवाल मुजफ्फरनगर, विक्रम सैनी कवाल मुजफ्फरनगर, राधेश्याम शामली, घनश्याम शामली, इसरार शामली, वीरेन्द्र सिंह देवबंद सहारनपुर, अमित बड़ौत बागपत, सुबोध बड़ौत बागपत, ओमप्रकाश बड़ौत बागपत, प्रमोद बड़ौत बागपत, मनोज मवाना मेरठ, मोनू मवाना मेरठ, प्रशांत मवाना मेरठ, अश्वनी मवाना मेरठ, राहुल मवाना मेरठ, विकास मवाना मेरठ, सोनू मवाना मेरठ, संगीत सोम विधायक सरधना मेरठ शामिल हैं।
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