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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 18, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

छठी शताब्दी के आसपास राजा राव किला बनने की तस्दीक

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Published: Fri, 18 Oct 2013 10:39 AM (IST)Updated: Fri, 18 Oct 2013 11:23 AM (IST)

लखनऊ। उन्नाव के डौंडियाखेड़ा में संत शोभन सरकार और वैज्ञानिकों की तकनीकी ने भले आज राजा

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लखनऊ। उन्नाव के डौडिया खेड़ा स्थित किला दुनिया भर में अपने खजाने के लिए चर्चा में है। अस्तित्व की जंग लड़ रहा अमर क्रंतिकारी का किला, रियासत का इतिहास, क्राति व समृद्धि से भरा है। गंगा की गोदी में बसा चंद्रिका देवी की छत्रछाया में यह क्षेत्र खेती के लिए मशहूर था। इसका नाम मर्दन खेड़ा, संग्रामपुर अच्छी लगान की लालच में हर राजा इसे अपनी रियासत बनाना चाहता था। इसके चलते यहा विद्रोह भी था। उन्हीं विद्रोहियों के एक समूह ने यहा किला व बस्तिया बसाईं। उस समय इसे बागसर कहा जाता था। जिसका बिगड़ा रूप बक्सर है। माना जा रहा है कि छठी शताब्दी में यहा भर जाति के विद्रोही समाज के नेताओं ने किले का निर्माण किया था। माना यह भी जा रहा है मगध और दिल्ली के बीच बसा यह क्षेत्र व्यापारिक मार्ग था। यहा के लोग व्यापारियों से लूट करते थे जिससे इन्हें अक्सर आक्त्रमण सहना पड़ता था। इसके चलते यहा किले का निर्माण कराया गया था। इसकी ईंटों से लगता है कि इसका निर्माण मुगलकाल में हुआ था। इतिहास के बारे में जानें तो डौडिया खेड़ा के इतिहास का पुराणों में जिक्त्र है। इसके अलावा ह्वेंनसाग व फाह्यंान का भी जिक्त्र है। लेकिन किले का इतिहास छठी शताब्दी में बताया जा रहा है। झा व सुमाली की उत्तर भारत के उद्गम का इतिहास में उन्होंने इस क्षेत्र का जिक्त्र किया है। उनके अनुसार हिंदू बागियों का जिक्त्र किया, जिन्हें वह गंगा के किनारे बसा बताया है। कन्नौज के इतिहास में उन्होंने भर राजाओं का जिक्त्र किया है जो कन्नौज और बनारस के बीच स्थित स्थान है। बताया है कि कन्नौज के राजाओं से त्रस्त बागियों ने यहा एक राज तंत्र स्थापित कर लिया था। तब इसे बागसर कहा जाता था उन्होंने एक जिक्त्र यह भी किया है। कन्नौज का शासक महेंद्र हारने के बाद इन्ही क्षेत्रों में शरण लिये था। तब इसका नाम देवरायगढ़ या मर्दनगढ़ नाम का जिक्त्र है। इसके बाद के यहा के इतिहास में भी यहा के भर राजाओं का जिक्त्र हैं। डॉ चंद्रा के उत्तर भारत के इतिहास में भी एक जगह देवडिय़ा खेड़ा का जिक्त्र आता है। उन्होंने लिखा है कि रायबरेली इस्टेट में 10वीं के इतिहास यहा भर राजाओं का जिक्त्र किया है। माना जा रहा था कि यह एक समृद्ध क्षेत्र था, यह अधीन होते हुए भी अधीन नहीं था। यहा के राजा जिसे राजा नहीं माना जाता था एक मजबूत किला था।

क्षेत्र का इतिहास तो 13वीं शताब्दी से : 13वीं शताब्दी में इस क्षेत्र का जिक्र आता है। उस समय अर्गल राजाओं के आधीन था। यह गौतमी ठाकुर थे। इनके अंदर अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर बादा के कुछ क्षेत्र आते थे। अर्गल राजा 1320 के पास अर्गल नचिकेत सिंह के दो बड़े सिपाह सालार अभय सिंह व निर्भर सिंह का जिक्त्र आता है। बताया गया है कि उस समय ही बैसवारा में वैश्य ठाकुरों का उदय हो रहा था जिनके कारण इसे वैशवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह को विरोधी सेना ने घेर लिया तो निर्भर व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। उन्होंने इस युद्ध में अर्गल राजा ने इस क्षेत्र को भरों से कुछ हद तक जीत लिया था। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था) और फ तेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह यहा के राजा हुए थे। अभय सिंह को यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में दो पीढिय़ा लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्त्र आता है। बताया जाता है मर्दन सिंह ने 15 वीं शताब्दी में राज सत्ता संभाली थी। उस समय यह रा'य मुगलों के अधीन आ गया था। कहा जाता है कि मुगल शासकों से बचने के लिए 15वीं शताब्दी के अंत में मर्दन सिंह ने इस किले का नव निर्माण कराया था। इसमें प्रयुक्त लाखौरी ईंटें भी इसकी गवाही देती है। 60 बीघा में फैले किले में 40 बीघा में किले का निर्माण कराया गया था। गंगा किनारे बसा होने के कारण यह अभेद्य दुर्ग माना जाता था। जहागीर के शासन में यह पूरी तरह उसके आधीन आ गया था। यहा की लगान से जहागीर इतना खुश था कि बदरका और इस किले को ही अपना कोषागार भी बनाया था। 16वीं शताब्दी में यहा राजा त्रिलोक चंद थे। उन्होंने पूरे बैसवारा क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाया। यहीं इस वंश को वैश्य ठाकुर होने का भी प्रमाण मिलता है। तब इस रियासत को संग्र्रामपुर कहा जाता था। 17वीं शताब्दी में यह लखनऊ के नवाब के आधीन आ गया। इस किले का अगला इतिहास तब आया जब राजा राम राव बक्स सिंह ने राज संभाला।

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