यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 28, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बहराइच में 1500 करोड़ रुपये की परियोजना अधर में
सपना संजोया गया कि खेती से तकदीर संवारने की यह मुहिम और ताकत पाएगी, लेकिन यह बहुआयामी योजना मंझधार में ही फंस गई है।

बहराइच (विजय द्विवेदी)। जनप्रतिनिधियों व ब्यूरोक्रेसी की अनिच्छा के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश की 1500 करोड़ की एक महत्वपूर्ण परियोजना दम तोड़ रही है। इस धान बहुल क्षेत्र को सिंचाई के संकट से उबारने के लिए सरयू नहर परियोजना शुरू की गई थी। सपना संजोया गया कि खेती से तकदीर संवारने की यह मुहिम और ताकत पाएगी, लेकिन यह बहुआयामी योजना मंझधार में ही फंस गई है।
हर हाथ को काम और खेत को पानी देने के लिए बहराइच, श्रवस्ती, गोंडा, सिद्धार्थ नगर, बलरामपुर, बस्ती व महाराजगंज जिले की खेती को इस योजना के तहत राप्ती मुख्य नहर के पानी से तर करने का मसौदा तय किया गया। किसानों की खेती के लिए पानी उपलब्ध कराने वाली नहर की लंबाई 150 किलोमीटर है। सरयू परियोजना के तहत तीसरे चरण में राप्ती लिंक चैनल व राप्ती मुख्य नहर का निर्माण किया जाना प्रस्तावित था।
इसके लिए वर्ष 2012 के नवंबर माह में निविदा ई-टेंडरिंग के माध्यम से आमंत्रित की गई। कहने को तो ई-टेंडरिंग की व्यवस्था अपनाई गई लेकिन इसमें किसी प्रकार की पारदर्शिता नहीं बरती गई। हैदराबाद, महाराष्ट्र, कोलकाता की फर्मों को कार्य आवंटित किया गया। इस टेंडर प्रक्रिया में नियमों की पूरी तरह से अनदेखी की गई। किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा नहीं हुई।
प्रत्येक लाट पर एक या दो टेंडर ही आए। सिंचाई ठेकेदार समिति की मानें तो इसमें अधिकारियों और पूर्व सरकार के नेताओं की मिलीभगत से इन कार्यों को काली सूची में दर्ज दूसरे प्रदेश के फर्मों को लाभ देने के लिए विभागीय दर से अधिक दर पर काम का एग्रीमेंट कर दिया गया। कहा गया कि इन कंपनियों यह कार्य समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण कराने के लिए दिया गया है।
अनुबंध के तहत यह कार्य मार्च 2015 में राप्ती मुख्य नहर का निर्माण हो जाना चाहिए था, लेकिन समयावधि बीत जाने के बावजूद भी इन फर्मों द्वारा अभी तक कार्य पूर्ण नहीं किया गया, जबकि समय वृद्धि दो बार विभाग द्वारा दिया जा चुका है। बताया जाता है कि अनुबंध में समयावृद्धि का कोई प्रावधान नहीं है। समयावधि बढ़ने से कार्य की लागत भी बढ़ रही है। इससे जनता के पैसे का सीधे दुरुपयोग किया जा रहा है।
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विभागीय सूत्रों की मानें तो अभी तक 50 फीसद तक ही कार्य हो पाया है। यह भी कहा जाता है कि काम करने वाली फर्में काली सूची में हैं। यह भी तथ्य प्रकाश में आया है कि कतिपय अधिकारी अपने और फर्मों को लाभ देने के लिए तीसरी बार समयावृद्धि देने व अनुबंधित दरें बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
