यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 12, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
दो नंबर के लिए भिड़ रहीं आप-कांग्रेस
राजकिशोर, नई दिल्ली। काशी में लड़ाई सीट जीतने से बहुत आगे की है। नरेंद्र मोदी से लड़ने वालों को भी ...और पढ़ें

[राजकिशोर], नई दिल्ली। काशी में लड़ाई सीट जीतने से बहुत आगे की है। नरेंद्र मोदी से लड़ने वालों को भी उनकी जीत पर शक नहीं है। बस सवाल है कि कौन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री (पीएम) प्रत्याशी को चुनौती दे पाया। भाजपा व संघ परिवार के सामने चुनौती है अपने नेता को ऐतिहासिक जीत दिलाने की। वहीं, कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय व आम आदमी पार्टी (आप) संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच नंबर दो की जंग है। यह खिताब भी उसी को मिलेगा, जिसके पास मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा जाएगा। कांग्रेस व आप की भविष्य की सियासत के लिए काशी का नतीजा बहुत मायने रखता है।
अंतिम चरण में सोमवार को 41 सीटों पर मतदान होना है, लेकिन देश-दुनिया की निगाहें हिंदुस्तान की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी पर टिक गई हैं। गौरवशाली अतीत के भग्नावशेष से आगे देख रही काशी की जनता के लिए यह पिछले कई दशक का सबसे हाईप्रोफाइल चुनाव है। दरकते घाटों, सिमटती व मैली होती गंगा की धार, बजबजाती गलियां, बढ़ती बेरोजगारी जैसी अनगिनत समस्याओं से जूझता यह प्राचीन शहर इस दफा बिल्कुल नई सियासी स्थिति में फंसा है। जिस दिन मोदी ने यहां से चुनाव लड़ना तय किया था, उसी दिन से काशी राजनीतिक गतिविधियों की राजधानी बन गई।
कौन लड़ रहा मोदी से:
राममंदिर आंदोलन के बाद अपने चरित्र व मिजाज से ही भाजपा के लिए मुफीद रही इस सीट पर मोदी को हराने के लिए संयुक्त प्रत्याशी तक की बात उठी, लेकिन अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के बोझ में दबे व विरोधाभासों से घिरे राजनीतिक दल ऐसा करने में नाकामयाब रहे। इसके बाद मोदी ने जिस दिन परचा भरा, उस दिन के ऐतिहासिक शक्ति प्रदर्शन के बाद नतीजों को लेकर वैसे ही कोई शक्-सुबहा नहीं बची थी, लेकिन यहां लड़ाई जीत-हार से ज्यादा अहम है। सवाल है कि मोदी से कौन ताकत के साथ लड़ सकता है। दरअसल, यही वह संदेश है जो वाराणसी के करीब तीन लाख मुस्लिम वोटरों को उनकी तरफ मोड़ सकता है। माफिया डॉन व कौमी एकता दल के संयोजक मुख्तार अंसारी चुनाव लड़ते तो शायद यह मुद्दा ही नहीं था, क्योंकि उस स्थिति में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा तबका उनके साथ जा सकता था। मुख्तार ने खुद चुनाव लड़ने या पत्नी को लड़ाने के बजाय कांग्रेस के समर्थन का एलान किया है। पिछले लोकसभा चुनाव में अंसारी को एकमुश्त मुस्लिम वोट मिले थे। हालांकि अंसारी के एलान के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी को मुस्लिम मतदाताओं का पूरा समर्थन मिलने के आसार कम ही हैं।
केजरीवाल का गणित:
कांग्रेस की तरफ से प्रत्याशी घोषित करने से लेकर प्रचार को परवान चढ़ाने में हुई देरी इसके लिए जिम्मेदार है। मोदी के काशी से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही केजरीवाल पूरे दल-बल के साथ वाराणसी में जम गए थे। केजरीवाल मैली यमुना वाली दिल्ली की गद्दी छोड़कर गंगा के तट पर मोदी से टकराने यूं ही नहीं आए। मोदी विरोधी सियासत की धुरी के रूप में खुद को पेश कर उन्होंने दिल्ली नहीं देश भर के मुस्लिमों के बीच पैठ बनाने का बड़ा कार्ड खेला। दिल्ली में तो इसका असर लोकसभा चुनाव के दौरान दिखा भी। हालांकि, ईमानदार सियासत व काशी को बदलने जैसे उनके नारों व वादों पर उनका दिल्ली छोड़कर भागना धब्बे की तरह है। इसीलिए, वाराणसी के मध्य वर्ग में तो उनकी पैठ नहीं दिखी। अलबत्ता, केजरीवाल ने जितने लोगों को टिकट दिया था और उनके सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं ने काशी को पूरी तरह मथ डाला। उनकी सारी उम्मीदें मुस्लिम वोटरों से हैं और उनके बीच केजरीवाल खुद सबसे ज्यादा समय बिता रहे हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे उत्तर प्रदेश के प्रमुख दल यहां कहीं टक्कर में नहीं है। पढ़े-लिखे मुस्लिम तबके में केजरीवाल का असर भी बनारस में साफ दिख रहा है। दो दिन पहले हुए केजरीवाल के रोड शो में उमड़ी भीड़ ने सबके कान खड़े कर दिए थे।
राय का स्थानीय कार्ड:
कांग्रेस ने प्रत्याशी चयन करने में खासी देर कर दी। इसके बाद कांग्रेस ने अपने विधायक व बाहुबली प्रत्याशी अजय राय को जब उतारा तो पूरे जोर-शोर से। प्रियंका गांधी तक ने राय से बात की, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस बहुत सक्रिय नहीं दिखी। अलबत्ता, कांग्रेस के मुस्लिम नेता खासतौर से गुलाम नबी आजाद व सलमान खुर्शीद ने यहां डेरा लगाया, लेकिन सड़क पर दम दिखाने के बजाय देश भर से मुस्लिम उलेमाओं या नेताओं को बुलाकर इस तबके का समर्थन जुटाने में पूरी ताकत झोंकी। जगह-जगह बैठकें कर स्थानीय बनाम बाहरी प्रत्याशी का मुद्दा बनाया। केजरीवाल के रोड शो के दूसरे दिन राहुल गांधी के साथ अजय राय ने जो शो किया वह उनसे किसी भी तरह कम नहीं था, बल्कि उसकी खासियत यह थी कि उसमें वाराणसी के मुस्लिम ज्यादा दिख रहे थे। हालांकि, शाम को सपा के रोड शो में जब अखिलेश आए तो भी भीड़ जमकर उमड़ी। यह सारा शक्ति प्रदर्शन वास्तव में मुस्लिम वोटरों को संदेश देने के लिए था। इसके बाद यहां अल्पसंख्यकों में भ्रम दिख रहा है। हालांकि, माना जा रहा है कि केजरीवाल मुसलमानों की पहली पसंद हो सकते हैं। अब कांग्रेस के प्रयास व अंसारी की अपील के असर की परीक्षा सोमवार को ही होगी।
