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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 30, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया थर्ड जेंडर की परिभाषा, समलैंगिक इस कैटेगरी में नहीं

By Sanjeev TiwariEdited By:
Published: Thu, 30 Jun 2016 04:16 PM (IST)Updated: Thu, 30 Jun 2016 10:20 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में दिए अपने फैसले में बदलाव करने से इनकार दिया है। इस फैसले में कोर्ट ...और पढ़ें

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नई दिल्ली(एएनअाई)। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गे, लेस्बियन और बाइसेक्सुअल थर्ड जेंडर की कैटेगरी में नहीं आते हैं सिर्फ ट्रांसजेंडर ही थर्ड जेंडर की कैटेगरी में आते हैं।

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में दिए अपने फैसले में बदलाव करने से इनकार दिया है। इस फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के तौर पर मान्यता दी थी।

कोर्ट के फैसले का स्वागत

ट्रांसजेंडर के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने ट्रांसजेंडर परिभाषा के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि हमारे सम्मान और मौलिक अधिकारों की हत्या हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने हमें बचाया है।

जानिए क्या था मामला

दरअसल सुप्रीम कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में ट्रांसजेंडर की परिभाषा स्पष्ट करने के लिए कहा गया था। सरकार की तरफ से दायर याचिका में यह भी पूछा गया था कि क्या गे, लेस्बियन, बाइसेक्सुअल अौर ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) को ओबीसी के तहत माना जाए और क्या ओबीसी को मिलने वाली सुविधाएं इस कम्युनिटी को भी दी जाए।

केंद्र ने अदालत से कहा कि उसे कोर्ट के फैसले को लागू करने में परेशानी हो रही है, क्योंकि ऑर्डर के एक पैरे में लेस्बियन, गे और बाइसेक्सुअल को भी ट्रांसजेंडर के साथ थर्ड जेंडर की कैटेगरी में रखा गया है।
इस पर कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई उलझन की स्थिति नहीं है। इसमें साफ-साफ लिखा है कि लेस्बियन, गे और बायसेक्सुअल थर्ड जेंडर की कटैगरी में नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह फॉर्म में थर्ड जेंडर की कटैगरी बनाए। कोर्ट ने थर्ड जेंडर को ओबीसी मानने और इस आधार पर एजुकेशन और नौकरी में रिजर्वेशन देने की भी बात कही।

जानिए, 2014 में सुप्रीमकोर्ट का क्या फैसला था

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2014 में एक अहम फैसला सुनाते हुए या ट्रांसजेंडर्स को तीसरे लिंग के रूप में पहचान दे दी थी। इससे पहले उन्हें मजबूरी में अपना जेंडर 'मेल' या 'फीमेल' बताना पड़ता था। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही ट्रांसजेंडर्स को सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के रूप में पहचान करने के लिए कहा था। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में एडमिशन लेते वक्त या नौकरी देते वक्त ट्रांसजेंडर्स की पहचान थर्ड जेंडर के रूप में की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किन्नरों या थर्ड जेंडर की पहचान के लिए कोई कानून न होने की वजह से उनके साथ एजुकेशन या जॉब के सेक्टर में भेदभाव नहीं किया जा सकता।

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