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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 14, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

चौथी बार मनोहर पर्रीकर ने संभाली गोवा के मुख्यमंत्री पद की कमान

By Kamal VermaEdited By:
Published: Tue, 14 Mar 2017 12:19 PM (IST)Updated: Wed, 15 Mar 2017 06:41 AM (IST)

पर्रीकर के नेतृत्व में एक बार फिर से गोवा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई।

चौथी बार मनोहर पर्रीकर ने संभाली गोवा के मुख्यमंत्री पद की कमान
चौथी बार मनोहर पर्रीकर ने संभाली गोवा के मुख्यमंत्री पद की कमान

नई दिल्‍ली, जेएनएन। मनोहर पर्रीकर मंगलवार की शाम चौथी बार गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही, एमजीपी के मनोहर अजगांवकर और निर्दलीय विधायक रोहन खुंटे ने भी गोवा सरकार में मंत्री पद की शपथ ली। पर्रीकर को राज्यपाल ने सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया था।जिस वक्त पणजी में मनोहर पर्रीकर ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली उस समय गोवा के मुख्यमंत्री लक्षीकांत पारसेकर भी वहां पर मौजूद थे।

सिर्फ गोवा के विकास के लिए भाजपा को समर्थन

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद पर्रीकर ने कहा कि गोवा में भाजपा को सरकार गठन करने के लिए जो समर्थन दिया गया है वह सिर्प विकास के लिए है। कोई भी विधायक कांग्रेस को समर्थन नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि यदि आपके पास सरकार बनाने का समर्थन था तो फिर आप राज्यपाल के पास क्यों नहीं गए। पर्रीकर ने आगे कहा कि मैं मानता हूं कि गोवा में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। लेकिन, 22 विधायकों के एक साथ आने से इनका वोट शेयर पर्याप्त है। यह चुनाव के बाद का गठबंधन है।

मनोहर पर्रीकर ने चौथी बार ली गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ, देखें तस्वीरें

सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस को नहीं मिली राहत

उधर, गोवा में मनोहर पर्रीकर के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन को चुनौती देने पहुंची कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इनकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कांग्रेस से पूछा कि अगर उनके पास बहुमत था तो वह दावा करने राज्यपाल के पास क्यों नहीं गई। राहत सिर्फ इतनी मिली है कि अब पर्रीकर को एक दिन बाद 16 मार्च को ही सदन में बहुमत साबित करना होगा।

जाहिर है कि गोवा के बाद मणिपुर में भी कांग्रेस के हाथ से पूरी बाजी भाजपा के हाथ में जा रही है। मणिपुर में दूसरे छोटे दलों के साथ साथ कांग्रेस के एक विधायक ने भी भाजपा को समर्थन दे दिया है। ऐसे में मंगलवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पहुंची कांग्रेस को केवल सीख मिली। कोर्ट ने राज्यपाल के निर्णय में कोई हस्तक्षेप करने से इनकार करते कांग्रेस की इस दलील को भी मानने से इनकार कर दिया कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार गठन का पहला हक कांग्रेस को था। एक मौके पर तो कोर्ट कांग्रेस की याचिका से नाराज भी दिखा। कोर्ट ने पूछा कि जरूरी विधायकों का समर्थन लेकर कांग्रेस राज्यपाल के पास गई थी या नहीं?

कांग्रेस ने अपनी याचिका में भी दूसरे छोटे दलों के उन विधायकों का कोई एफिडेविट नहीं दिया था जिसके समर्थन से बहुमत का आंकड़ा पाया जा सकता था। पर्रीकर को पार्टी भी बनी बनाया गया था लेकिन शपथग्रहण पर रोक की मांग की जा रही थी। दरअसल कांग्रेस का यह आधार ही गलत है। कोर्ट के निर्णय के बाद केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी तर्को और उदाहरणों के साथ कांग्रेस की दलील का खंडन कर दिया। जेटली ने लगभग आधा दर्जन उदाहरण पेश किया।

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उन्होंने कहा कि 2005 में झारखंड की 81 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन 17 सीटों वाली पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अन्य दलों को साथ लेकर बहुमत का आंकड़ा पा लिया और सरकार बनाया। ऐसी ही घटना 2002 में जम्मू-कश्मीर में भी हुई थी जब सबसे बड़ी पार्टी नेशनल कांफ्रेस थी। इसे 28 सीटें मिली थी लेकिन 21 और 15 सीटों पर सफलता पाने वाली पीडीपी और कांग्रेस ने गठबंधन सरकार बनाई थी। खुद दिल्ली में 2013 में भाजपा 31 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन 28 सीट पाने वाले आप को कांग्रेस ने समर्थन देकर सरकार बनाने के काबिल बनाया था।

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ऐसे उदाहरण मद्रास, राजस्थान और हरियाणा में भी रहे हैं। जेटली ने 1988 में वाजपेयी सरकार का भी उदाहरण दिया। खुद तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी कहा था कि जब कोई एक पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन स्पष्ट बहुमत नहीं पाता है तो उस पार्टी या पार्टियों के समूह के नेता को एक निश्चित समयावधि में सदन के पटल पर शक्ति परीक्षण का अवसर दिया जाना चाहिए। जेटली ने कहा कि गोवा मे यही हुआ है जब राज्यपाल के पास सबसे पहले भाजपा जरूरी 21 सदस्यों का समर्थन लेकर पहुंची। राज्यपाल के पास और कोई प्रस्ताव भी नही हैं।