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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 30, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

क्रिकेट में नाकाम बेटे के हाथ कमान

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Published: Mon, 30 Sep 2013 07:50 PM (IST)Updated: Mon, 30 Sep 2013 07:55 PM (IST)

क्रिकेट की पिच पर पिट चुके राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी के मत्थे अब दोहरी चुनौती है। ...और पढ़ें

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रांची [प्रदीप सिंह]। क्रिकेट की पिच पर पिट चुके राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी के मत्थे अब दोहरी चुनौती है। अदालत के फैसले के कुछ दिन पहले ही राजनीतिक पिच पर तेजस्वी की इंट्री करा लालू प्रसाद ने स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि राबड़ी देवी की बजाय सीधा मोर्चा तेजस्वी ही संभालेंगे। चारा घोटाले में लालू जब पहली बार जेल गए थे तो उन्होंने मुख्यमंत्री की गद्दी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी। उस वक्त राबड़ी देवी के नाम के प्रस्तावकों में से एक तत्कालीन मंत्री रामचंद्र पूर्वे भी थे। पूर्वे बताते हैं कि लालू जब भी मुश्किलों में घिरे हैं तो वे और ज्यादा मजबूत बनकर सामने आए हैं। पूर्वे पार्टी के समक्ष संकट को सिरे से नकारते हैं। वैसे 15 साल पहले और आज के हालात में बड़ा अंतर है।

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लालू लंबे समय से बिहार की सत्ता से बाहर हैं और लोकसभा में भी उनके चुनिंदा नुमाइंदे हैं। 2014 का चुनाव सामने है। जदयू की कांग्रेस से बढ़ती नजदीकी अलग सिरदर्द है। ऐसे में सबको साधकर राजद को समेटे रहना सबसे बड़ी चुनौती है। लालू के वैसे विश्वस्तों का साया भी तेजस्वी पर रहेगा जिन्होंने बुरे वक्त में उनका साथ नहीं छोड़ा, लेकिन मोर्चे पर अगुवाई तेजस्वी ही करेंगे। इसकी झलक रांची की विशेष अदालत में मिली।

फैसला सुनाए जाने के ऐन पहले तेजस्वी अदालत के भीतर आए। वे पिता के पीछे खड़े हो गए। पास में निजी सचिव भोला राय, प्रभुनाथ सिंह आदि थे। बाद में रघुवंश प्रसाद सिंह भी दिखे। फैसला आने के बाद तेजस्वी ने संयम नहीं खोया। हंसकर तनाव टालने की कोशिश की। बार-बार अपने पिता से सलाह-मशविरा करते रहे। लालू दो बार जब अपनी बातें कहने उठे तो तेजस्वी की निगाहें उन पर ही टिकी रहीं। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद लालू जब कोर्ट रूम से बाहर निकलने को तैयार हुए तो एकाएक नए सिरे से हलचल हुई। बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार तक उन्हें ले जाने के लिए सफेद रंग की एंबेसडर को सीबीआइ की विशेष अदालत की पोर्टिको में खड़ा करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। खुद लालू भी भीड़ के आगे बेबस दिख रहे थे। कार रेंग रही थी और लगभग एक दर्जन युवक पैदल निकल रहे तेजस्वी के लिए रास्ता बनाने की मशक्कत कर रहे थे। अब राजनीति की डगर पर तेजस्वी को खुद अपने लिए रास्ता बनाना पड़ेगा। इस डगर पर कील-कांटे ज्यादा हैं और वक्त बड़ा नाजुक है।

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