यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 14, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
यूं ही नहीं छेड़ा मुलायम ने मायावती से हाथ मिलाने का राग
न संकेत, न संभावना और न वक्ती सियासत की जरूरत। फिर भी सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बसपा ...और पढ़ें

राज्य ब्यूरो, लखनऊ। न संकेत, न संभावना और न वक्ती सियासत की जरूरत। फिर भी सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बसपा से दोस्ती का दरवाजा खुला रखने जैसा बयान देकर आलोचनाओं को न्योता दिया है, तो इसके सियासी निहितार्थ तलाशे जाने लगे हैं। माना जा रहा है कि मुलायम सिंह की कोशिश अल्पसंख्यकों के बीच यह संदेश देने की है कि उत्तर प्रदेश में उनसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष कोई नहीं है और भाजपा को रोकने के लिए वह किसी हद तक जा सकते हैं। इसीलिए बसपा ने इसका तीखा प्रतिरोध कर इस इम्पैक्ट को कम करने की कोशिश भी की है।
बिहार और उत्तर प्रदेश की सियासत में लालू और मुलायम लगभग एक जैसी राजनीति करते आए हैं। दोनों की राजनीति की धुरी एमवाई (मुस्लिम और यादव) समीकरण ही रहे हैं। विधानसभा चुनाव में यह फैक्टर अपना असर दिखा सकता है, इसीलिए मुलायम अल्पसंख्यकों पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ना चाहते। यही वजह है कि भाजपा के उभार से बेचैन बिहार के क्षत्रप लालू यादव ने नीतीश से हाथ मिला बसपा-सपा गठजोड़ का आह्वान किया, तो राजनीति के सुजान मुलायम ने इसे लपक लिया।
पार्टी के एक बुजुर्ग नेता कहते हैं कि मुलायम जानते हैं कि यह 1992 का दौर नहीं है, जब दलित राजनीति को नया आयाम देने वाले कांशीराम ने मुलायम को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करते हुए गठबंधन खड़ा किया था। मगर, जून 1995 में स्टेट गेस्ट हाउस कांड के साथ गठबंधन टूटकर दुश्मनी में बदल गया। एक-दूसरे का विरोध दोनों को वोट बैंक की एकजुटता देता है।
भाजपा ने मुलायम की हताशा करार दिया
भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने बसपा से गठबंधन के बयान को सपा प्रमुख मुलायम सिंह की हताशा करार दिया है। वाजपेयी का कहना है कि भाजपा से डरे दोनों दलों के नेतृत्व की दशा ऐसी हो गई है जैसे बाढ़ से डरे सांप- नेवला एक नाव पर सवार होने को तैयार हों। वाजपेयी ने कहा कि बहुमत की सपा सरकार होने के बाद भी मुलायम का इस तरह का बयान चुनाव से पहले ही पराजय स्वीकारने वाला है।
