यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 17, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मौत के बाद इस मार्मिक दृश्य को देख किसी को भी रोना आ जाए
निवाले हलक से नीचे उतरे नहीं कि दम लबों पर आ गया। मंगलवार को प्राथमिक विद्यालय धरमासती गंडामन में मिड-डे ...और पढ़ें

छपरा। निवाले हलक से नीचे उतरे नहीं कि दम लबों पर आ गया। मंगलवार को प्राथमिक विद्यालय धरमासती गंडामन में मिड-डे मील खाकर बेसुध हुए बच्चों के अभिभावकों की पीड़ा कातर आंखों से आंसुओं की धार बनकर बह रही थी। रुंधे गले में लफ्ज अटक जा रहे थे। अपने दोनों बेटों को खो चुके हरेंद्र का कलेजा जार-जार हो रहा था। इकलौती पुत्री के शव के सामने विलाप करते अजय को देखकर दूसरे लोग भी रो देते। इकलौते पुत्र को खोने के गम से बदहवास हुए राजू साह की आंखों से झड़ी लगी हुई थी। मृत बच्चों के परिजनों के विलाप से सदर अस्पताल के कोने-कोने में कयामत की थरथरी थी।
अपनी आंखों के आगे पड़े बेटी के शव को देख अजय बेहाल थे। बरबस बोल पड़े क्या पता था कि सरकारी विद्यालय में बिटिया को पढ़ाने का यह हश्र होगा? उन्हें इस बात की भी चिंता सताए जा रही थी कि वे परिजनों को कौन सा मुंह दिखाएंगे? जब भी उनके सेलफोन की घंटी बजती वे बेबस होकर कॉल को कट कर देते थे। आसपास के लोग उन्हें सांत्वना देने का भरसक प्रयास कर रहे थे, लेकिन कलेजे की हूक अजय के बदन को हिलाए दे रही थी।
इससे कम बदहवास आलम नहीं था हरेंद्र और राजू साह के साथ। हरेंद्र की स्थिति तो पागलों जैसी हो गई थी। वे अपने दोनों बच्चों राहुल व प्रह्लाद को खो चुके हैं। राजू साह के घर का इकलौता चिराग ही बुझ गया है। उनके पुत्र शिव ने सदा के लिए आंखें मूंद ली है। परिजनों के चीत्कार से पूरा अस्पताल परिसर गमगीन हो गया है। अस्पातल पहुंचने वाले हर किसी की आंखें नम हो जा रहीं। शवों से लिपटे कुछ परिजनों के तो जैसे होंठ ही सिल गए हैं। दिल से दुख कुछ इस कदर भारी गुजरा है। जिनके बच्चों की धड़कनें अभी तड़प रही हैं, वे ऊपर वाले से उनकी जान बख्श देने का गुहार लगा रहे।
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