यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 05, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
समिति ने माना जस्टिस गांगुली को दोषी
सुप्रीम कोर्ट जांच समिति ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके गांगुली पर प्रशिक्षु महिला वकील की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न ...और पढ़ें

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट जांच समिति ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके गांगुली पर प्रशिक्षु महिला वकील की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया है। समिति ने रिपोर्ट में कहा है, 'जस्टिस गांगुली का व्यवहार आपत्तिजनक था।' हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने यह कहते हुए आगे कार्रवाई करने से किनारा कर लिया है कि आरोपी जज घटना के समय सेवानिवृत्त हो चुके थे और महिला वकील सुप्रीम कोर्ट में प्रशिक्षु नहीं थी। इस मामले में अब तक शांत रहीं तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जस्टिस गांगुली के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, जस्टिस गांगुली ने बिना रिपोर्ट पढ़े टिप्पणी से इन्कार किया है।
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जांच समिति की रिपोर्ट के बाद जस्टिस गांगुली के लिए मुसीबतें बढ़ सकती हैं। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई से हाथ खींच लिए हों, लेकिन उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के रास्ते जरूर खुल गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एसएन सिंह पहले ही दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में इस मामले में शिकायत दर्ज करा चुके हैं। सेवानिवृत्त जज पर यौन उत्पीड़न के आरोप वाली खबरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) पी. सतशिवम ने आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की जांच समिति बनाई थी। समिति ने मामले की जांच कर 28 नवंबर को अपनी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौंप दी थी। बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायाधीश की ओर से जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष सार्वजनिक किया गया। समिति ने पाया कि 24 दिसंबर, 2012 की शाम प्रशिक्षु वकील जस्टिस गांगुली को काम में मदद करने के लिए होटल ली मेरेडियन गई थी। जस्टिस गांगुली ने भी इससे इन्कार नहीं किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशिक्षु के मौखिक और लिखित बयान से पहली निगाह में जस्टिस गांगुली के प्रशिक्षु के साथ आपत्तिजनक व्यवहार का पता चलता है। होटल में 24 दिसंबर, 2012 की शाम 8 से 10.30 बजे के बीच जस्टिस गांगुली का प्रशिक्षु वकील के साथ शाब्दिक और आचरणगत व्यवहार आपत्तिजनक था। सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूरी रिपोर्ट के बजाय फलहाल इन्हीं निष्कर्षो को सार्वजनिक किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को जांच समिति की 27 नवंबर की रिपोर्ट की प्रति प्रशिक्षु वकील और जस्टिस एके गांगुली को देने का निर्देश दिया है। जस्टिस गांगुली को दोषी मानने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आगे कार्रवाई से इन्कार करते हुए कहा है कि महिला वकील सुप्रीम कोर्ट के रोल पर प्रशिक्षु नहीं थी और जस्टिस गांगुली घटना के पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में आगे कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है। मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि मीडिया रिपोर्ट से पता चलता था कि जज सुप्रीम कोर्ट के थे। इसीलिए जांच समिति का गठन किया गया था।
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'सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट मीटिंग में बृहस्पतिवार को फैसला किया गया है कि पूर्व जज पर कार्रवाई की मांग वाले ज्ञापनों पर भी सुप्रीम कोर्ट प्रशासन विचार नहीं कर सकता है।' -पी. सतशिवम, सीजेआइ
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'सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति द्वारा जस्टिस गांगुली के प्रशिक्षु वकील के साथ व्यवहार को गलत मानने के बाद उनका पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बने रहना उचित नहीं है।' -सुषमा स्वराज, लोस में नेता विपक्ष
अपना ही आदेश भूली शीर्ष अदालत
नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। यौन उत्पीड़न की पीड़ताओं की पहचान गोपनीय रखने का आदेश देने वाले सुप्रीम कोर्ट से आज खुद चूक हो गई। कोर्ट ने प्रशिक्षु यौन उत्पीड़न मामले में जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने के साथ ही पीड़िता का नाम भी उजागर कर दिया। हालांकि, थोड़ी ही देर में सुप्रीम कोर्ट को गलती का अहसास हो गया और उसने प्रशिक्षु मामले में मुख्य न्यायाधीश की ओर से जारी की गई रिपोर्ट से पीड़िता का नाम हटा दिया। गौरतलब है कि पीड़िता का नाम उजागर करना दंडनीय अपराध है। सुप्रीम कोर्ट कई बार अपने फैसलों में पीड़िता का नाम गोपनीय रखने का आदेश दे चुका है।
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