यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 27, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
परमाणु क्षमता से लैस अग्नि पांच के साथ अब 'कंचनबाग' से भी डरेगा चीन
अग्नि-पांच मिसाइल की कामयाबी में हैदराबाद के कंचनबाग की अहम भूमिका रही।

हैदराबाद(जेएनएन)। सोमवार का दिन भारत के लिए खास बन गया। परमाणु क्षमता से युक्त अग्नि-पांच मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद अब भारत के निशाने पर करीब-करीब पूरा चीन आ गया है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी जगह है या यूं कहें कि ऐसा पता जो चीन को हमेशा परेशान करती रहेगी। हैदराबाद का कंचनबाग वो पता है जहां पर अग्नि-पांच मिसाइल की कामयाबी के लिए दिन-रात मेहनत की गई।
कहानी अग्नि-पांच की
अग्नि-पांच की मारक क्षमता को रक्षा अधिकारी 5000 किमी तक सीमित रखना चाहते हैं। लेकिन मिसाइल की मारक क्षमता 8000 से 10 हजार किमी तक बढ़ाई जा सकती है। ओडिशा के ह्वीलर आइलैंड से अग्नि-पांच को उसके सर्वाधिक मारक क्षमता पर छोड़ा गया था।
भारत की सबसे शक्तिशाली मिसाइल अग्नि-5 का सफल परीक्षण
डीआरडीओ के अधिकारियों ने कहा कि भारत के लिए ये एक महत्वपूर्ण कामयाबी है। अगर भारत अब अमेरिका, रूस, चीन और दूसरे परमाणु क्षमता युक्त मिसाइल बनाने वालों की कतार में आया है तो उसमें कंचनबाग का अहम योगदान है।
कंचनबाग में अग्नि-पांच की पड़ी नींव
अग्नि-पांच मिसाइल को हैदराबाद के कंचनबाग में डिजाइन किया गया था। इस प्रोजेक्ट पर करीब 200 वैज्ञानिकों ने दिन-रात काम किया था। इनमें से 100 वैज्ञानिक वो लोग थे जो अग्नि मिसाइल की पिछली श्रृंखला से जुड़े हुए थे।
अग्नि-पांच मिसाइल के ज्यादातर कलपुर्जों को कंचनबाग (हैदराबाद) में ही बनाया गया था। मिसाइल से जुड़े कलपुर्जों की डिजाइनिंग एपीजे अब्दुल मिसाइल कॉम्पलेक्स, एडवांस्ड सिस्टम लाइब्रेरी, डीआरडीएल में की गई थी। अग्नि पांच मिसाइल का पहला परीक्षण डीआरडीओ के डीजी रहे वी के सारस्वत के कार्यकाल के दौरान 2012 में की गई थी। पहले की परीक्षणों की तरह अग्नि-पांच के अलग अलग हिस्सों को हैदराबाद ओडिशा के ह्वीलर आइलैंड तक ट्रकों में लादकर ले जाया गया, फिर ह्वीलर आइलैंड पर मिसाइल की असेंबलिंग की गई।
भारत के लिए अहम कामयाबी
रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ जी सतीश रेड्डी ने बताया कि ये मिसाइल परीक्षण के क्षेत्र में अहम कामयाबी है। इस परीक्षण की खास बात ये है कि इसमें स्वदेशी उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। अग्नि पांच के परीक्षण में प्रोग्राम डॉयरेक्टर डॉ एमआरएम बाबूू और प्रोजेक्ट डॉयरेक्टर जी रामगुरू की अहम भूमिका रही।
