यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 15, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
गाय पर बरपा है हंगामा, कहीं सिर्फ सियासत तो नहीं हो रही
यह पड़ताल करना भी लाजिमी हो जाता है कि गाहे-बेगाहे आए दिन गाय से जुड़ा मुद्दा क्यों सुर्खियों में छाया ...और पढ़ें

शुभम वर्मा
हाल में केरल के युवा कांग्रेसियों द्वारा गोकशी के मामले पर मचा हंगामा थमा भी नहीं था कि उसके अगले ही दिन आइआइटी मद्रास में बीफ पार्टी का आयोजन किया गया। यह पूरा बखेड़ा गोवध के उस सरकारी आदेश के कथित विरोध में था जिसके नियमों को अभी तक सरकार ने भी अंतिम रूप नहीं दिया है। इससे विरोध करने वालों की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक है जिसके मूल में नि:संदेह राजनीति है। विरोध भी मोटे तौर पर उन्हीं वामपंथियों द्वारा ही किया जा रहा है जो भारतीय परंपराओं का मखौल उड़ाने को ही अपना प्रिय शगल मानते हैं। देश में उपलब्ध खाने-पीने के तमाम विकल्पों में सिर्फ गोमांस खाने की जिद पर अड़ना भी उनके उसी रुख-रवैये का परिचायक है, क्योंकि उन्हें यह भली-भांति मालूम है कि देश के एक बड़े तबके में गाय को मां के रूप में पूज्यनीय माना जाता है और केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि दूसरे कई पंथों में गाय को यह दर्जा हासिल है। ऐसे में यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि अपनी विशेष किस्म की नफरत वाली राजनीति को चमकाने के लिए ही वे इतनी मशक्कत कर रहे हैं।
इस बीच यह पड़ताल करना भी लाजिमी हो जाता है कि गाहे-बेगाहे आए दिन गाय से जुड़ा मुद्दा क्यों सुर्खियों में छाया रहता है। इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने भी पलटने होंगे। यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि सत्रहवीं शताब्दी तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। भारतीय निर्यात का दुनिया में बोलबाला था। यहां के मसालों, अनाज, कपड़े, लकड़ी के सामान जैसी वस्तुओं की तूती बोलती थी। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि प्राथमिक चरण में वस्तुओं का निर्माण होता है। दूसरे चरण में उनकी बिक्री होता है। तीसरे चरण में सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इनमें भी प्राथमिक क्षेत्र सबसे अहम होता है। इसमें कच्चे माल की दरकार होती है। उस समय अधिकांश भारतीय खेती से ही जुड़े थे। देश की जरूरत पूरी करने के बाद निर्यात के लिए भी काफी हिस्सा बच जाता था। भारत की यह समृद्धि अंग्रेजों के लिए भी पहेली थी। रॉबर्ट क्लाइव ने इसे सुलझाने का निश्चय किया। उसे मालूम पड़ा कि भारत की इस सफलता के मूल में ‘गाय’ है। गाय के गोबर से खाद और गोमूत्र से कीटनाशक बनाए जाते थे। खेती में बैल काम आते थे। गाय के दूध और उससे बने दही, छाछ, मक्खन और घी जैसे तमाम उत्पाद पूरे परिवार को पोषण प्रदान करते थे। फसल अवशेष ही गाय का चारा बन जाता था। इस तरह गाय भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ रही।
इस गुत्थी को सुलझाते ही क्लाइव ने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने के लिए कलकत्ता में पहला बूचड़खाना खुलवाया। वहां एक दिन में 30,000 गायें काट दी जाती थीं। इसके साथ ही किसानों के हाल और बदहाल होते गए। गोबर खाद की जगह अंग्रेज अपना यूरिया और फॉस्फेट भारत में बेचकर मोटा मुनाफा कमाने लगे। किसानों को खाद और कीटनाशकों के लिए भुगतान करना पड़ता और बैलों के बिना खेती मुश्किल होती गई। इसी बीच बंगाल में अकाल पड़ गया। एक तो उत्पादन कम हुआ जो हुआ उसे अंग्रेजी सेना के लिए हड़पकर किसानों को भुखमरी के लिए मजबूर छोड़ दिया गया। इस पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विस्ंटन चर्चिल से एक पत्रकार ने सवाल किया तो उन्होंने बड़ा बेहूदा जवाब दिया कि अगर भारत के लोग मर रहे हैं तो गांधी अब तक क्यों नहीं मरा। इस तरह अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए भारत की गाय आधारित अर्थव्यवस्था को तबाह किया जिसका खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है।
भारत की धार्मिक परंपराओं में भी गाय का विशेष महात्म्य रहा है। भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं में गाय बेहद अहम रहीं। असल में गोवंश भारत के समाज में गहराई से रचा-बसा रहा। उसकी भरण-पोषण की प्रवृत्ति को देखते हुए उसे मां का दर्जा दिया गया, क्योंकि मां के लिए किसी को भूखा रखना गवारा नहीं होता। केवल हिंदू परंपराओं में नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन और सिख मतों की पुस्तकों में भी गाय की हत्या पर निषेध का उल्लेख है। दक्षिण भारत के चोल राजा मधु निधि चोल ने अपने पुत्र को मृत्युदंड सुनाया था, क्योंकि एक गाय ने उनके राज्य में न्याय का घंटा बजाया था, जिससे पता चला था कि उसका बछड़ा राजकुमार के रथ के नीचे कुचल कर मर गया था। सिख साम्राज्य के समय राजा रणजीत सिंह ने राज्य में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। यहां तक कि हैदर अली ने अपने राज्य में गोहत्या पर हाथ काट देने का नियम बनाया था।
मुगलों में भी अकबर और जहांगीर ने कुछ स्थानों पर गोहत्या को प्रतिबंधित किया था। 1857 में बहादुर शाह जफर ने भी ऐसा ही किया। मराठा साम्राज्य में भी गोवध वर्जित था। पहले स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भी इसी बात पर भड़की थी कि सैनिक मंगल पांडे ने गाय की चर्बी वाले कारतूस चलाने के इन्कार कर दिया था। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय जैसे नेता भी आजादी के आंदोलन में लोगों से यही कहते थे कि स्वतंत्रता मिलने पर सबसे पहला कार्य गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का करेंगे। यहां अफसोस इसी बात का है कि आजादी के बाद देश में बूचड़खानों की संख्या बढ़कर 36,000 तक पहुंच गई। यही नहीं कुछ भारतीय भी अंग्रेजी और वामपंथी प्रभाव में आकर गोमांस खाने की वकालत करने लगे।
हालांकि आज भी गोरक्षा और उसकी उपयोगिता को लेकर तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। देश में तमाम गोशालाएं हैं। वहां गाय के गोबर से जैविक खाद और गोमूत्र से कीटनाशक बनाए जा रहे हैं। इससे लोगों को जहरीले कीटनाशक से उपजे अनाज से मुक्ति मिल रही है। बैलों की वजह से ट्रैक्टर और डीजल पर निर्भरता कम हो रही है।
महाराष्ट्र में कोल्हापुर जिले के शेल्केवाड़ी गांव में प्रत्येक घर में गाय के गोबर से बनने वाली गोबर गैस से ही खाना पकाया जाता है। यह गांव एलपीजी से भी मुक्त हो गया है। यही नहीं अब गोबर गैस के गाड़ियां भी चलने लगी हैं।
प्राचीन आयुर्वेद में गाय के पंचगव्य तथा गोमूत्र से कई बीमारियां ठीक होने का वर्णन है। आज कई कंपनियां इससे दवाएं बनाकर असाध्य रोगों के उपचार में मदद कर रही हैं। गाय के घी से किये गए अग्निहोत्र यज्ञ से वायु से जहरीली गैस हटाकर उसे शुद्ध करने के प्रयोग तो जापान के हिरोशिमा, नागासाकी तथा भोपाल में गैस त्रसदी के बाद किए ही जा चुके हैं।
धार्मिक मान्यताओं से इतर यदि सिर्फ ऐतिहासिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक पक्ष ही देखा जाए तब भी गाय भारत ही नहीं, अपितु समस्त संसार के लिए बेहद उपयोगी जीव सिद्ध होती है। शायद इसीलिए अमेरिका गोमूत्र पेटेंट करा रहा है। ब्राजील गिर गाय की नस्ल को बढ़ा रहा है, लेकिन इसके उलट भारत में वह राजनीति का जरिया बनने पर मजबूर है।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर में शोधार्थी हैं)
