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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 25, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सूखे के अंदेशे से डरी सरकार और वैज्ञानिक

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Published: Tue, 25 Feb 2014 10:15 AM (IST)Updated: Tue, 25 Feb 2014 10:18 AM (IST)

रिकार्डतोड़ खाद्यान्न पैदावार का डंका पीटकर आगामी चुनाव में लाभ लेने की केंद्र की संप्रग सरकार की मंशा पर आगामी ...और पढ़ें

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नई दिल्ली, [सुरेंद्र प्रसाद सिंह]। रिकार्डतोड़ खाद्यान्न पैदावार का डंका पीटकर आगामी चुनाव में लाभ लेने की केंद्र की संप्रग सरकार की मंशा पर आगामी खरीफ सीजन में गंभीर सूखे के पूर्वानुमान से पानी फिरता नजर आ रहा है। अलनीनो के खौफ से नीति नियामकों की नींद हराम हो गई है। कृषि क्षेत्र समेत देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे इस खतरे की चुनौती से निपटने की तैयारियां शुरु कर दी गई हैं।

खेती पर आसन्न संकट को कम करने के लिहाज से देश के 500 जिलों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार कर ली गईं हैं। इन योजनाओं को अंतिम रूप देने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और नीति नियामकों की उच्च स्तरीय बैठक 26 और 27 फरवरी को आयोजित की गई है। इसमें केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी हिस्सा लेंगे। इस दौरान अलनीनो से पैदा होने वाली मुश्किलों का समाधान तलाशा जाएगा। सभी राज्यों के कृषि से संबंधित आला अफसरों और प्रमुख वैज्ञानिकों को भी बुलाया गया है।

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चालू फसल वर्ष 2013-14 में सर्वाधिक 26.30 करोड़ टन की पैदावार होने का अनुमान है, जो अब तक का सर्वाधिक है। इसका श्रेय बीते मानसून की अच्छी बारिश को दिया जा रहा है। लेकिन आगामी सीजन में गंभीर सूखा पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इससे कृषि वैज्ञानिकों में घबराहट है। दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद से नीति नियामकों की सांसे भी तेज हो गई हैं। अलनीनो के प्रभाव से समस्त एशिया प्रक्षेत्र के देशों में मानसून की बारिश के प्रभावित होने का गंभीर खतरा है। दरअसल अलनीनो के प्रभाव का तात्पर्य समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गरम होता है। इससे मानसूनी हवाएं कम बनती हैं और बनती भी हैं तो उनकी दिशा बदल जाती है। वर्ष 2009 में अलनीनो के प्रभाव से ही भारत में गंभीर सूखा पड़ा था। इसका असर कृषि व अन्य क्षेत्रों समेत देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। उस समय देश में खाद्यान्न का उत्पादन पिछले सालों के मुकाबले बहुत कम सिर्फ 21.81 करोड़ टन हुआ था।