यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 06, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
जज्बे को सलाम, गाय और बैल बेच कर बिटिया को बनाया फुटबॉलर
भारत में पहली बार होने जा रहे अंडर-17 विश्वकप का स्लोगन है-फुटबॉल टेक्सओवर। भारतीय खेल इतिहास के लिए यह दिन ...और पढ़ें

दुमका (राजीव)। कहते हैं दुनिया फुटबॉल की तरह है। गोल। वहीं, भारत में यह लगभग गोल है। यहां क्रिकेट चलता है। कहते हैं धर्म है। इसी के चलते यहां दूसरे सभी खेल लगभग गोल हैं। हालांकि, इसी देश में मां-बाप ने गाय-बैल बेचकर अपनी बिटिया को फुटबॉलर भी बनाया है। भारतीय खेल जगत के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है। विश्व फुटबॉल की शीर्ष संस्था फीफा की मानें तो फुटबॉल टेकओवर करने जा रही है। शायद क्रिकेट का। भारत में पहली बार होने जा रहे अंडर-17 विश्वकप का स्लोगन है-फुटबॉल टेक्सओवर। भारतीय खेल इतिहास के लिए यह दिन ऐतिहासिक है। लिहाजा, सुमित्रा, पुष्पा, दुलड़ व शिवानी का जिक्र प्रासंगिक होगा। भारत में खेल व खिलाड़ी बनने के मायने, और क्या फुटबॉल सचमुच टेकओवर कर पाएगा? इन लड़कियों की कहानी ऐसे सभी सवालों के जवाब खुद बयां करती है।
चर्चा गरीबी की
सुमित्रा पर चर्चा हुई। लेकिन, फुटबॉल पर नहीं हुई। इस पर हुई कि किस से तरह गरीब आदिवासी की बेटी फ्रांस और जॉर्डन तक जा पहुंची। जहां प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं थीं। इन्होंने कैसा खेला? खेल को बढ़ाने में इनका योगदान? भारत में महिला फुटबॉल का भविष्य? ये बातें पीछे छूट गईं। सुमित्रा के मातापिता प्रधान मरांडी और फूलमुनी ने गाय-बैल बेचकर और जमीन बंधक रख बिटिया को फुटबॉलर बनाया। यह बात आदर्श स्थापित कर सकती थी, अगर फुटबॉल से जुड़ी होती। फुटबॉल के लिए नहीं। अदद सरकारी नौकरी के लिए यह त्याग किया गया। मरांडी दंपती ने लक्ष्य हासिल भी किया। बिटिया ने खेल कोटे से सीमा सुरक्षा बल में नौकरी पा ली। यही दुलड़, शिवानी और बाकी खिलाड़ियों के साथ हुआ। भारत में फुटबॉल या अन्य खेलों का खेल यहीं आकर खत्म हो जाता है। सुमित्रा फिलहाल बंगाल के सिलिगुड़ी में पदस्थ हैं।
बात करते हैं झारखंड के दुमका की सुमित्रा की झारखंड के दुमका से कुछेक 15 किमी दूर, गादी कोरैया पंचायत के लतापहाड़ी गांव, और इसकेअंतिम छोर पर बसे एक गरीब किसान परिवार की बिटिया हैं सुमित्रा। पूरा नाम है सुमित्रा मरांडी। झारखंड में एक और जगह है, गुमला। जहां की पुष्पा तिर्की हैं। इनका नाम भी शायद ही कुछ लोगों ने सुना हो। दोनों आदिवासी बालिकाएं हैं। पुष्पा भी सुमित्रा जैसी ही पृष्ठभूमि से हैं। लेकिन इन दोनों का असल परिचय यह नहीं है। दोनों भारतीय सीनियर महिला फुटबॉल टीम की सदस्य हैं। सुमित्रा कमाल की डिफेंडर हैं। गत सैफ गेम्स और एशियन चैंपियनशिप की टीम में जगह बनाने पर दोनों चर्चा में आईं।
सुमित्रा को किया सम्मानित : झारखंड में दुमका के लतापहाड़ी गांव की रहने वाली राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी सुमित्रा मरांडी को उपायुक्त मुकेश कुमार ने गुरुवार को सम्मानित किया। इनडोर गेम्स के मौके पर उपायुक्त मुकेश कुमार ने सुमित्रा को सम्मानस्वरूप शॉल भेंट की। उन्होंने कहा कि सुमित्रा ने दुमका ही नहीं झारखंड का मान बढ़ाया है।
दुमका की दुलड़ मरांडी और शिवानी सोरेन भी राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेल चुकी हैं और खेल की बदौलत ही इन्हें एसएसबी और सीआरपीएफ में नौकरी मिली है। -सुमित्रा मरांडी, फुटबॉल खिलाड़ी
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