यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 15, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
फिरंगियों से खुदवाई थी कांटों की बाड़
सन् 1857 स्वाधीनता संग्राम में मेवात के रणबांकुरों ने मुल्क को फिरंगियों से आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की ...और पढ़ें

नई दिल्ली। सन् 1857 स्वाधीनता संग्राम में मेवात के रणबांकुरों ने मुल्क को फिरंगियों से आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिरंगियों ने मेवात के सौ गांवों को जलाया और 1085 लोगों को फांसी पर चढ़ाया। उस समय मेवात गुड़गांव जिले का हिस्सा था।
1939 वर्ग मील में बसे गुड़गांव की जनसंख्या छह लाख 62 हजार 500 थी, जिसमें मेवात के मेव समुदाय की संख्या एक लाख दस हजार चार सौ थी। जिले में दक्षिण का बड़ा भाग मेवात कहलाता था। मेवात क्षेत्र चारों तरफ से अंग्रेजो की पिट्ट रिसायतों से घिरा हुआ था तो वीर मेवों ने साहस नहीं छोड़ा। प्रत्येक युद्ध में वीरता की छाप छोड़ी। इतना ही नहीं रायसीना गांव में मेवों ने अंग्रेजों से न केवल कांटों की बाड़ खुदवाई, बल्कि अंग्रेज अधिकारियों व सिपाहियों के सिर कलम कर चौपाल की सीड़ियों में दफनाएं गए। क्रांति की विफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे गांवों को भयानक सजाएं दी। अंग्रेजों ने रायसीना व आसपास के गांव नूनेहरा, मुहम्मदपुर, सांपकी नंगली, हरियाहेडा, बाईकी और हिरमथला की भूमि को अपने भक्तों को पुरुस्कार स्वरूप दे दिए, जिसकी प्रशंसा अंग्रेज सेना के अधिकारियों ने भी की है।
अधिकारी लार्ड केनिंग ने लिखा है कि मेव कौम ने मुसलिम बादशाहों को भी तंग किया था और हमें तो बहुत अधिक परेशान किया है। मेवाती किसानों की धाड़ ने तलवार, बल्लम, बंदूकों और लाठियों से जिस युद्ध कौशल का परिचय दिया उससे अंग्रेज भी हैरान थे। इस गदर में मेवाती क्रांतिकारियों ने सोहना, घासेडा नूंह, फिरोजपुर झिरका, रुपडाका, पिनगंवा तथा तावडू को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। जहां से वे न केवल अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किए बल्कि दिल्ली के क्रांतिकारियों की सहायता के लिए भी सैनिक तथा आर्थिक मदद भेजी। अल्प खां रायसीना व सदरुद्दीन पिनगंवा ने इस संग्राम में मेवों की अगुवाई की। रायसीना गांव में लोगों ने अंग्रेजों को बैल की जगह गहाटे में जोड़कर उनसे कांटेदार बाड खुदवाई।
यह इस क्रांति में ऐतिहासिक घटना रही है। दिल्ली पतन के बाद शांति कायम करने के बहाने अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए भारी जुल्म किए। नूंह में खैरूगाह नाम खानजादे की शिकायत पर अंग्रेजों द्वारा नूंह, अडबर व शाहपुर नंगली के 52 लोगों को फांसी दी गई। इन शहीदों में चार अडबर के, बारह शाहपुर नंगली व बाकी नूंह के रहने वाले थे। ये फांसी आज के पुराने बस स्टैंड के पास एक बरगद के पेड के नीचे दी गई। इस समय मेवली गांव के चौधरी मेदा ने बीच में आकर लोगों को अंग्रेजों के जुल्म से छुडाया था। इसी प्रकार तावडू में भी तीस लोग शहीद हुए। इसके अलावा फिरोजपुर झिरका में 11, मूह 42 लोगों को फांसी दी गई। गांव दोहा, रुपडाका सहित कई जगहों पर सैकड़ों लोगों को फांसी दी गई। इस गदर के दौरान पचानका, गोहपुर, मालपुरी, चिगी, उटावड़, कोट, मूगला, मीठाका, खिगूका, गुराकसर, मालूका और झांडा के चार सौ लोग फिरंगी सेना से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। इन शहीदों की याद में नूंह में शहीदी पार्क, फिरोजपुर डिारका, दोहा व रूपडाका में शहीद मीनार सहित 11 मीनारें बनाई गई है, ताकि आने वाली पीढ़ी देश पर मर मिटने वाले शहीदों को याद रख सके। इतना ही नहीं इतिहासकार सद्दीक अहमद मेव ने संग्राम 1857, मेवातियों का सहयोग, मेवात एक खोज, मेवात की संस्कृति सहित कई पुस्तकें लिखी है। जिनमें मेवात के शहीदों व विशेषताओं को सुंदर वर्णन किया गया है।
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