यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 18, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
पांच राज्यों के कारण पिछड़े मुसलमान
नई दिल्ली [जाब्यू]। देश में मुसलमानों के हक और तरक्की को लेकर अक्सर उठते सवालों के बीच केंद्र ने राज्यों ...और पढ़ें

नई दिल्ली [जाब्यू]। देश में मुसलमानों के हक और तरक्की को लेकर अक्सर उठते सवालों के बीच केंद्र ने राज्यों को घेरना शुरू कर दिया है। केंद्र की नजर में उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य मुसलमानों के अब तक पिछड़े रहने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। केंद्र के लिए यह स्थिति और खराब है कि मुसलमानों के मामले में जरूरी कदम उठाने को लेकर राज्य सरकारें उसे तवज्जो भी नहीं देती हैं। साल भर से अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री रहते हुए के. रहमान खान मुसलमानों की तालीम, तरक्की और सामाजिक बदलाव की स्थिति को लेकर कमोवेश कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं।
खान का मानना है कि अगर ये पांचों राज्य सक्रिय हो जाएं तो मुसलमानों की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों के कार्यक्रमों पर राज्यों से जरूरी सहयोग नहीं मिल पाता। खान के मुताबिक, वह अल्पसंख्यकों के कार्यक्रमों को लेकर सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख चुके हैं। हालांकि, किसी ने जरूरत के मुताबिक रुचि नहीं दिखाई। उन्होंने अक्टूबर के पहले हफ्ते में देश के सभी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की बैठक बुलाई थी। उत्तर प्रदेश में दो वक्फ बोर्ड हैं, लेकिन किसी ने शिरकत नहीं की। वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए उन्होंने कंप्यूटरीकरण का जिक्र करते हुए बताया कि केंद्र धन दे चुका है। राज्य सरकारें उसे खर्च करने में भी उदासीन हैं। खान मानते हैं कि देश का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन सांप्रदायीकरण की कोशिशें हो रही हैं। अक्टूबर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में भी ऐसे ही प्रयास किए गए थे। दरअसल, चुनावी फायदे के लिए कुछ ताकतें देश में ही सांप्रदायिकता का रास्ता अपनाने में लगे हैं। यह खतरनाक संकेत है।
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