यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 04, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
जिदंगी का तो बस अफसोस रह गया..
जिंदगी को दुखों के थपेड़ों ने कुछ इस कदर तार-तार कर दिया कि इस जीवन का अफसोस ही बाकी रह ...और पढ़ें

अल्मोड़ा [बृजेश तिवारी]। जिंदगी को दुखों के थपेड़ों ने कुछ इस कदर तार-तार कर दिया कि इस जीवन का अफसोस ही बाकी रह गया है। जिसके साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं। आज उसी का साथ छोड़ने का गम मन को साल रहा है। गुरुवार को जब पति सुरेंद्र कोली को फांसी देने के लिए तिथि करीब तय होने का समाचार मिला तो जिंदगी की कठिन डगर में जीवन का रास्ता ढूंढ रही शांति टूट-सी गई। कभी पति के साथ खिंचवाई पुरानी तस्वीरों पर नजर जाती है तो कभी छह वर्ष के बेटे शिवम और आठ साल की बेटी सीमा को चेहरा देखकर बिलख उठती है। शांति कोली आज भी सुरेंद्र को निर्दोष मानती है। उसका कहना है कि इतने बड़े मामले में सिर्फ सुरेंद्र को ही मोहरा क्यों बनाया जा रहा है। मो¨हदर सिंह पंधेर की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उसने कहा कि आखिर उसके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज करने के बाद उसने कहा कि उन्हें तो उस जुर्म की सजा दी जा रही है, जो उन्होंने किया ही नहीं। शांति मानती है कि निठारी कांड मामले में कई लोगों को बचाने का प्रयास किया गया। लेकिन गांव के सीधे-सादे सुरेंद्र के प्रति दया नहीं दिखाई गई।
