यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 05, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
रिश्तों की दुहाई और राहुल गांधी
उनके घर में माहौल कुछ बदला हुआ है लेकिन राहुल गांधी का का मानो इससे कोई सरोकार ही नहीं। पुरानी ...और पढ़ें

अमेठी [दिलीप सिंह]। उनके घर में माहौल कुछ बदला हुआ है लेकिन राहुल गांधी का का मानो इससे कोई सरोकार ही नहीं। पुरानी मुस्कान..बात को अपने ढंग से समझाने की कोशिश और 'भैया..' का वही पुराना संबोधन। कुछ पुराने बुजुर्ग मिले तो उनके बीच अधकचरी अवधी। मोहनगंज में रामदेई नामक वृद्धा को देखते ही ठिठक जाते हैं-'का हाल बा काकी..' रामदेई का चेहरा खिल सा जाता है और राहुल को मानो उनके सवाल का जवाब मिल जाता है।
चिर परिचित मुस्कान मगर अपरिचित-सी लगने वाली गंभीरता। इसमें थोड़ा एंग्री यंगमैन वाला तेवर और गंभीर ढंग से किए जाने वाले कटाक्षों को जोड़ दीजिए तो राहुल गांधी का पूरा व्यक्तित्व सामने आ जाता है। अपने संसदीय क्षेत्र की सभाओं में नमस्कार से शुरू हुआ संबोधन सामने वालों से सीधे जोड़ देता है। फिर न हालचाल न कोई और बहाना। सीधे भावनाओं के सधे तीर छूटने लगते हैं। पापा राजीव गांधी के दिनों की याद से भावनाओं को छूने का काम वे अच्छी तरह करना जानते हैं। दस मिनट तक माहौल यूं ही चलता है और फिर शुरू हो जाती हैं मोदी से लेकर अडानी तक की बातें। थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुर्ते की आस्तीन को ऊपर की ओर सिकोड़ना। चुनाव लड़ रहे विपक्षी उम्मीदवारों पर किसी भी तंज से परहेज। विकास कार्यो को गिनाने की कड़ी में जनता से संवाद भी। अचानक पूछते हैं-'पहले कितने हाईवे थे?' भीड़ से जवाब आता है-एक। राहुल दोहराते हैं- 'आज सात हैं। हम काम पर विश्वास रखते हैं।' अंत में नमस्कार पर बात खत्म।
क्षेत्र के चुनावी दौरे में राहुल संयत नजर आते हैं। रास्ते में न बातें, न ही कोई हंसी-मजाक। ऐसा लगता है जैसे किसी उधेड़बुन में हों। बहुत जरूरी हुआ तो किशोरी लाल शर्मा या फिर कनिष्क से थोड़ी-बहुत जानकारी ली। राह में कोई आ गया तो अचानक तेजी से हाथ हिलाकर अभिवादन। जायस में बुरका पहने महिलाएं नजर आ जाती हैं तो उनकी सफेद फार्च्यूनर गाड़ी रुक जाती है। उनसे नाम पूछते हैं। महिलाएं रुखसाना, शाजिया जैसा कुछ कुछ नाम बोलती हैं। अगला सवाल-'बिजली आती है।' जवाब नहीं में मिलता है। राहुल कहते हैं-'आप सब मजबूत बनो, प्रदेश में हमारी सरकार बनाओ, तो बिजली मिलेगी।' अमेठी के महिला समूहों के प्रति उनका विशेष अनुराग दिखता है। महिलाओं से कहते हैं-'आप अपना परिवार संभालने में सक्षम हैं। आपको अपनी ताकत और बढ़ानी होगी।' अमेठी में अपने चुनाव को लेकर एक निश्चिंतता का भाव उनमें हमेशा नजर आता है। शायद भावनात्मक संबंधों की वजह से। कहीं-कही इस लगाव का अहसास उनके संबोधनों में भी होता है। टीकरमाफी आश्रम में भीड़ से घिरने पर अचानक ही एक व्यक्ति से बोल पड़ते हैं-'भैया, काहे दक्का देत हौ?'
सुबह दस बजे से शुरू जनसंपर्क कार्यक्रम रात करीब दस बजे मुंशीगंज के गेस्ट हाउस पर आकर खत्म होता है। इतने व्यस्त कार्यक्रम में भी जिम में जाकर पसीना बहाने के उनके कार्यक्रम में बदलाव नहीं। कितनी भी रात हो, वहां तो जाना ही है।
