यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 12, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
योग पर महाभियोग
दर्शन और विज्ञान पंथिक मजहबी नहीं होते। योग परम स्वास्थ्य का विज्ञान है और अनंत का दर्शन, लेकिन योग

दर्शन और विज्ञान पंथिक मजहबी नहीं होते। योग परम स्वास्थ्य का विज्ञान है और अनंत का दर्शन, लेकिन योग के विरुद्ध हिंदू होने का महाभियोग है। कांग्रेस सहित कुछेक सांप्रदायिक संगठन योग विज्ञान पर आक्रामक हैं। अस्तित्व असीम और अनंत है। हम सब इकाई हैं और अस्तित्व संपूर्ण। इकाई होना दुख है और अनंत होना आनंद। योग इकाई में अनंत की अनुभूति है। योग का सीधा अर्थ ही है जोड़ना। पतंजलि ने 'योग सूत्र लिखे थे, लेकिन योग पतंजलि से भी प्राचीन है। गीता के अनुसार 'कर्मकुशलता ही योग' है। मनुष्य और ब्रह्मांड के एकात्म दर्शन का यह विज्ञान दर्शन भारत में उगा। दुनिया के अनेक देशों ने अपनाया, इसे योग के बजाय 'योगा' कहा। आधुनिक रहन-सहन से तनाव बढ़े हैं। योग तन मन स्वस्थ रखने की दिनचर्या बना है। योग विश्व को भारतीय ज्ञान साधना का अनूठा उपहार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में योग का प्रस्ताव रखा। 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित हुआ। प्रस्ताव को 170 से ज्यादा देशों का समर्थन मिला। इनमें 47 मुस्लिम देश हैं। इन 47 देशों सहित 191 देशों में योग दिवस मनाने की तैयारी है। अकेले अमेरिका में ही 100 शहरों में ऐसे आयोजन होंगे। न्यूयार्क के टाइम्स स्क्वायर में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव व भारतीय विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज भी रहेंगी। भारत स्वाभाविक ही योग विज्ञान की अंतरराष्ट्रीय महत्ता और मान्यता से आनंदित है। केंद्र सरकार ने भारत में भी 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का निश्चय किया है।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार शून्य का आविष्कार संभवत: हिंदुओं ने किया। अंक प्रतीक भी यहां पैदा हुए। अरबों ने उनका प्रयोग किया। उन्हें हिंदू अरेबिक कहा जाता है। क्या हिंदुओं द्वारा खोजे जाने के कारण अंक भी सांप्रदायिक हैं? एसएन सेन ने भारतीय गणित का विवेचन किया। लिखा है 'शब्दांक और दशामिक स्थानगत मूल्य में उनका व्यवहार अपूर्व भारतीय विकास है।' क्या हिंदुओं का शोध होने के कारण गैर हिंदू दशमलव प्रयोग छोड़ चुके हैं? 'साइंस एंड सिविलाइजेशन इन चाइना' में नीढम ने बीजगणित को भारतीय व चीनी विद्या बताया है? क्या बीजगणित छोड़ी जा सकती है? ऋग्वैदिक ऋषियों ने सूर्य को ऊर्जादायी बताया। नक्षत्रों की गति का अध्ययन किया। क्या प्रकृति विज्ञान से जुड़े निष्कर्षो को उनके ऋषि या हिंदू होने के कारण खारिज कर सकते हैं? गीता दर्शन ग्रंथ है। गीता के अंत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-'यह ज्ञान बताया है, विचार करो जो ठीक लगे सो करो।' लेकिन यहां गीता भी सांप्रदायिक है और योग पर भी विलाप है। मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदांत और योग भारत के 6 प्राचीन दर्शन हैं। बुद्ध और जैन दर्शन भी यहीं उगे थे। लेकिन सांख्य और योग प्राचीन दर्शन हैं। सारी दुनिया के विश्वविद्यालयों में दर्शन के विद्यार्थी ये 8 भारतीय दर्शन पढ़ते हैं। योग दुख दूर करने का विज्ञान है। योग में दर्शन और विज्ञान साथ-साथ हैं। यहां कोई अंधविश्वास नहीं और धार्मिक कर्मकांड भी नहीं। पतंजलि ने योग की परिभाषा की, 'चित्त वृत्ति की समाप्ति योग है।' गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया 'दुख संयोग से वियोग ही योग है।'
योग के अनुसार संकल्प, विकल्प, राग द्वेष और अवसाद विषाद का केंद्र मन है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने 'मन' को शरीर का ही सूक्ष्म हिस्सा माना है। वे अनेक रोगों के लिए 'साइको सूमैटिक'-मनोशरीरी शब्द प्रयोग करते हैं। मन की क्षमता विराट है-कभी यहां, पल भर में वहां। धरती आकाश कहीं भी। दुनिया के प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख ऋग्वेद में कहते हैं 'हम भूलोक, दिव्य लोक, समुद्र, अंतरिक्ष, वन या भूत भविष्य में गए मन को वापस लाते हैं।' मन से कहते हैं 'यहीं वापस आओ, आपका जीवन यहीं इसी संसार में है।' गीता में कहते हैं कि अस्थिर मन जहां जहां भागता है उसे वहां वहां से अपने भीतर लाना चाहिए। 'वायु न चलने पर दीपच्योति कंपित नहीं होती, ऐसे ही योग साधक का मन निष्कंप रहता है।' चित्तवृत्ति से कंपन है। योग सिद्धि में चित्त वृत्ति निरुद्ध है-चित्तं निरुद्ध योग सेवया। यहां कोई अंधविश्वास नहीं। ऋग्वेद से लेकर गीता और पतंजलि तक योग की वैज्ञानिक अविरल धारा है। स्वस्थ शरीर और एकाग्र मन आदिम अभिलाषा है। वैदिक ऋषि काम करते हुए 100 वर्ष जीने के अभिलाषी थे। वे ईसाइयत, इस्लाम या अन्य ईश्वर विश्वासी समाजों की तरह सुख, समृद्धि के लिए ईश्वर पर निर्भर नहीं थे। प्रकृति के हरेक प्रपंच में उनकी जिज्ञासा थी। ऋग्वेद में मन चंचलता के अनेक प्रसंग हैं।
यजुर्वेद के शिव संकल्प सूक्त में 'वन, पर्वत और आकाश में घूमते मन को कल्याण से जोड़ने' की स्तुति है। उपनिषदें की रचना वेदों के बाद हुई। केनोपनिषद् में ज्ञान स्नोतों को मन के साथ जोड़ने को उच्चतर चित्त अवस्था की प्राप्ति कहा गया है और इसे ही योग। श्वेताश्वतर उपनिषद् में, 'छाती, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए ज्ञान केंद्रों को मन से जोड़ने और प्राण वायु रोकने/भीतर लेने की योग विधि है।' यहां योगाभ्यास के लिए सुंदर भूमि का भी उल्लेख है। गीता उपनिषदें के बाद लिखी गई। गीता में योग का विस्तार से वर्णन है। पतंजलि सूत्र और बाद के हैं। भारतीय चिंतन में योग की शुरुआत का श्रेय 'हिरण्यगर्भ' को दिया गया है। महाभारत के रचनाकाल में योग और सांख्य ज्ञान प्रतिष्ठित थे। यहां ज्ञान के वक्ता कपिल हैं और योग के हिरण्यगर्भ। योग साधारण व्यायाम नहीं। योग सुसंबद्ध विज्ञान है। यहां चार चरण हैं-समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य। 8 अंग हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पतंजलि के सूत्र वैज्ञानिक हैं। वे आसन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से स्वयं बोध कराते हैं। ध्यान एकाग्रता है। प्रीतिकर विषय पर ध्यान की सुविधा है, 'यथाभिमतध्याना द्वा- जिसका जो अभिमत हो उस पर ध्यान करे। सब स्वतंत्र हैं। कहते हैं, 'अथवा ईश्वर पर प्राण लगाएं-ईश्वर प्रणिधाना द्वा'।
साधना का एक विकल्प ईश्वर भी है। वे ईश्वर की परिभाषा करते है, 'क्लेश, कर्म, कर्मफल और वासना से असंबद्ध चेतना विशेष ईश्वर है।' पतंजलि का ईश्वर मनुष्य चेतना का विशेष तल है। योग सूत्रों में आस्था और अंधविश्वास की कोई जगह नहीं। गणित विज्ञान की तरह यहां दो और दो चार ही होते हैं। पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें का बाजार सूत्र योग में भी लागू है। योग विरोधी योग करें, परिणाम देखें, तब बोलें। लेकिन किया क्या जाए? उन्हें भारत की हरेक उपलब्धि से गहरी खुन्नस है। इस खुन्नस का उपचार भी योग ही है।
[लेखक हृदयनारायण दीक्षित, उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं]
