यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 12, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सीमित महत्व वाला परीक्षण

जब भी लोकसभा या विधानसभा चुनावों के बाद कुछ सीटों पर उपचुनाव होते हैं तो उनके परिणामों को लेकर चारों ओर उत्सुकता पैदा हो जाती है। जहां सत्ता पक्ष के लोग उसको उतना महत्व नहीं देते वहीं विपक्ष यह जताने से नहीं चूकता कि वे परिणाम सत्तापक्ष की घटती लोकप्रियता का सूचक हैं, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के परस्पर विरोधी दावों के बावजूद जनता क्या सोचती है? और वास्तव में सच क्या होता है? अभी हाल के हुए लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला, लेकिन उसके बाद के विधानसभा उपचुनावों में उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में पार्टी उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी। उत्तर प्रदेश में 13 सितंबर को हो रहे 11 विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उपचुनावों में भी ऐसी ही उम्मीद है। कुल नौ राज्यों में उपचुनाव हो रहे हैं तो क्या यह माना जाए कि जिस जनता ने तीन माह पूर्व एक पार्टी को इतना जोरदार समर्थन दिया उससे उसका मोहभंग होने लगा है?
मोदी सरकार के सौ दिनों की समीक्षा करने पर ऐसा लगता नहीं। लोग सामान्यत: खुश हैं तथा नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के काम व काम करने के तरीके से चकित भी। कुछ बिंदुओं पर तो मोदी के विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते दिखाई दे रहे हैं। फिर लोकतंत्र में आलोचना का कुछ तो 'स्पेस' होना चाहिए। वैसे ही विपक्ष काफी कमजोर हो गया है, इसलिए उसके द्वारा जो भी आलोचना हो उसका स्वागत ही होना चाहिए। इसका कारण है कि आलोचना सरकार को लाभ ही देती है अगर वह तकरें और तथ्यों की उपेक्षा करे और जनता की सच्ची भावना पर आधारित न हो। इसका सबसे बड़ा प्रमाण स्वयं मोदी ही हैं, जितनी आलोचना उनकी विगत बारह वषरें में हुई, उसका लाभ उनको चुनावों में मिला और संभवत: आगे भी मिलेगा।
जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णयों से हज जाने वालों को किराए में छूट मिली तथा जम्मू-कश्मीर में भयंकर बाढ़ से आई विपत्ति से निपटा जा रहा है उससे मुसलमानों में उनके प्रति भरा गया भय खत्म हो रहा है। यह सुखद लगता है कि मोदी न हिंदू न मुसलमान की, वरन हमेशा 125 करोड़ भारतवासियों की बात करते हैं। जो लोग यह सोच रहे थे कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी सांप्रदायिकता को और बढ़ाएंगे वे बहुत निराश हो रहे हैं। तो क्या प्रधानमंत्री अपना ध्यान शासन और विकास पर लगाएं या कुछ विधानसभा या लोकसभा की सीटें जीतने पर, जिससे उनकी सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला? और अगर ध्यान देना ही है तो आगे आने वाले कई राज्यों-महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू-कश्मीर तथा बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर क्यों न ध्यान दिया जाए? उसके लिए मोदी ने अपने विश्वासपात्र अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना ही दिया है। तो फिर नरेंद्र मोदी सरकार की लोकप्रियता का उपचुनावों के परिणामों से क्या लेना-देना?
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पिछले लोकसभा चुनावों में मोदी का नेतृत्व भाजपा की जीत में सबसे महत्वपूर्ण पहलू था। लोगों ने पार्टी और प्रत्याशी न देखकर मोदी को विकास और सुशासन के लिए वोट दिया। अब उपचुनावों में न तो मोदी हैं, न ही मोदी सरकार की स्थिरता पर कोई संकट, तब स्थानीय मुद्दे और स्थानीय नेतृत्व के आधार पर वोटिंग क्यों न हो? फिर मतदाता इतना जागरूक हो गया है कि उसे लोकसभा और विधानसभा के चुनावों का फर्क साफ पता है और इसीलिए इन उपचुनावों में भाजपा को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लोकसभा जैसे परिणामों की उम्मीद नहीं करना चाहिए। अत: अमित शाह की भूमिका आगे के दो-तीन वषरें में काफी चुनौतीपूर्ण होने वाली है, जिसमें लगभग सात-आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होने हैं। उपचुनावों में पार्टियों के प्रचार की शैली भी भिन्न-भिन्न होती है। पार्टियों के बड़े नेता न तो उसके प्रचार में रुचि लेते हैं, न प्रादेशिक या राष्ट्रीय स्तर पर जनता में कोई रुचि होती है। ये चुनाव बेहद स्थानीय होते हैं। विगत चुनावों में बुरा प्रदर्शन करने वाली पार्टियां एकजुट हो जाती हैं, जैसा बिहार में हुआ जहां धुर विरोधी लालू यादव और नीतीश कुमार मिल गए और कांग्रेस को भी साथ ले लिया। लेकिन उससे समाज में संदेश क्या गया? वे चुनाव जीत गए, लेकिन क्या जनता का दिल भी जीत पाए? मोदी ने जनता के वोट ही नहीं, उसका दिल जीता था। राजनीतिक दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता का दिल जीतने वाला लंबी रेस का घोड़ा होता है। तो फिर उपचुनाव जीत कर मुख्य चुनाव हारना कैसा लगेगा? कब हम राजनीतिक जोड़-तोड़ और जातीय गुणा-भाग को छोड़ कर सुशासन, विकास और लोक-कल्याण की त्रिवेणी से निर्मित राजनीति को प्रश्रय देंगे?
पिछले कुछ दिनों में मोदी सरकार ने कुछ विवादित निर्णय भी लिए हैं, जिसमें न्यायाधीशों, राज्यपालों और विपक्ष के नेता की नियुक्तियां तथा योजना आयोग को खत्म करना आदि प्रमुख हैं। इन पर बराबर चर्चा होती रहनी चाहिए और देश केहित में क्या सही है, इस पर विमर्श जारी रहना चाहिए। लोकतंत्र हमें सार्थक बहस का मंच देता है और संसद उसका सर्वोच्च मंच है। लेकिन जिस तरह विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार ने परिपक्वता दिखाई है वह इसलिए सुखद आश्चर्य है, क्योंकि वही उनका सबसे कमजोर विकेट माना जा रहा था। ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम समझौता, जापान से स्मार्ट सिटी व बुलेट ट्रेन का करार, पड़ोसियों से बेहतर संबंध तथा आगे चीन, अमेरिका और अनगिनत अन्य देशों से जिस तेजी से वार्ता और समझौतों की झड़ी लगने वाली है उससे बहुत ही परिपक्व, सक्रिय और सुविचारित विदेशनीति का संकेत मिल रहा है। किसी देश की सरकार और जनता के लिए यह सब महत्वपूर्ण है या कुछ विधानसभा और लोकसभा की सीटें जीतना?
[लेखक डॉ. एके वर्मा, राजनीतिक विश्लेषक हैं]
