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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 06, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

संसदीय समिति करेगी डीयू में हुई नियुक्यिों की जांच

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Published: Mon, 06 Jul 2015 07:46 PM (IST)

राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों व विभागों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिय

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राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों व विभागों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में आरक्षण नीति के पालन पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब संसदीय समिति खुद इसकी पड़ताल करने जा रही है। आगामी 9 जुलाई को संसदीय समिति दिल्ली विश्वविद्यालय आ रही है। समिति के सदस्य यहां पहुंचकर इस बात की जांच करेंगे कि डीयू में पिछले पांच वर्षो में अनुसूचित जाति-जनजाति व ओबीसी के कितने पदों को भरा गया है। इस बात की भी जांच होगी कि कितनी बार विश्वविद्यालय ने विशेष अभियान चलाकर आरक्षित श्रेणी के खाली पदों पर नियुक्तियां करने का प्रयास किया है।

इस विषय पर विभिन्न मंचों से सवाल उठाते आ रहे दिल्ली विश्वविद्यालय एससी-एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम के प्रमुख व विद्वत परिषद् के सदस्य प्रो. हंसराज सुमन ने बताया कि काफी प्रयासों के बाद संसदीय समिति ने इस विषय के लिए डीयू में आने का निर्णय किया है। समिति बीते पांच सालों में कोटे के अंतर्गत आने वाले शिक्षकों के पदों की जांच करेगी। साथ ही यूजीसी गाइडलाइंस 2006 को लागू करते हुए एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के पदों के लिए आरक्षण कब से लागू किया गया और अभी तक कितने पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ और कितने पद भरे गए, इस बात की भी पड़ताल की जाएगी। सूत्रों की मानें तो इस दौरे में समिति की ओर से डीयू में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एम.फिल व पीएचडी के स्तर पर लागू हो रहे आरक्षण की भी पड़ताल की जा सकती है। यहां बता दें कि डीयू में कॉलेज व विभागों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में आरक्षण नीति पर सवाल उठते रहे हैं। यहां होने वाले दाखिलों में भी अक्सर इस श्रेणी के आवेदकों की ओर से भेदभाव व नियमों के सही ढंग से पालन न किए जाने के आरोप लगाए जाते हैं। इसके अलावा प्रोफेसर, कॉलेज प्राचार्य, निदेशक, निदेशक फिजीकल एजुकेशन, डीन, डिप्टी डीन व लाइब्रेरियन आदि के पद पर भी आरक्षण न दिए जाने को लेकर विभिन्न संगठन अक्सर सवाल खडे़ करते हैं।