यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 09, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सचिन का भी उस्ताद निकला यह खिलाड़ी, अब गेंद से मचाया कोहराम
विश्व क्रिकेट में शायद ही कोई ऐसा खिलाड़ी हो जो सचिन के करियर और उनकी सफलताओं को देखकर प्रेरित ना ...और पढ़ें

दाम्बुला [श्रीलंका]। विश्व क्रिकेट में शायद ही कोई ऐसा खिलाड़ी हो जो सचिन के करियर और उनकी सफलताओं को देखकर प्रेरित ना हुआ हो। आज मास्टर के नाम दुनिया के वह सभी रिकॉर्ड हैं जिन्हें तोड़ पाना नामुमकिन सा लगता है..लेकिन मुंबई का एक युवा क्रिकेटर शायद इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता।
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यह युवा क्रिकेटर है सरफराज खान, वही सरफराज खान जिन्होंने 2009 में प्रसिद्ध हैरिस शील्ड ट्रॉफी में सचिन के बल्ले से निकला दशकों पुराना रिकॉर्ड तोड़ डाला था, लेकिन इस बार उन्होंने कुछ ऐसा किया जो शायद सचिन भी अपने शुरुआती दिनों में नहीं कर सके थे।
सरफराज खान ने 2009 में सचिन द्वारा हैरिस शील्ड ट्रॉफी में बनाए एक पारी में 346 रनों के रिकॉर्ड को तोड़ा था। सरफराज ने अपनी मैराथन पारी में 439 रन ठोक डाले थे। लोकल क्रिकेट में उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए 15 वर्षीय इस खिलाड़ी को जल्द ही अंडर-19 टीम में शामिल कर लिया गया। कुछ समय तो वह सही मौके का इंतजार करते रहे, लेकिन इस बार उन्होंने मौके का फायदा भी उठाया और वह भी बल्ले से नहीं गेंद से।
दाम्बुला (श्रीलंका) में गुरुवार को मेजबान अंडर-19 श्रीलंकाई टीम के खिलाफ खेले गए यूथ वनडे सीरीज के तीसरे मैच में भारतीय अंडर-19 टीम से खेलते हुए सरफराज ने बल्ले से तो नहीं, लेकिन गेंद से कोहराम जरूर मचाया और उन्हीं की घातक गेंदबाजी के दम पर भारतीय टीम श्रीलंका को 39.1 ओवर में महज 137 रनों के अंदर समेटने में सफल रही। सरफराज ने अपने 7.1 ओवर में महज 27 रन देकर सर्वाधिक चार विकेट झटके, जिसमें मिडिल ऑर्डर के प्रमुख बल्लेबाजों के विकेट भी मौजूद रहे।
सचिन ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपने आगाज के दौरान बल्ले से तो दुनिया भर के तमाम दिग्गजों का ध्यान अपनी ओर खींचा था, लेकिन सरफराज ने बल्ले के बाद गेंद से भी जौहर दिखाने में कसर नहीं छोड़ी और यह साबित कर दिया कि वह सिर्फ एक शानदार बल्लेबाज ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन ऑलराउंडर भी हैं। दाएं हाथ के ऑफब्रेक गेंदबाज सरफराज अपनी इस गेंदबाजी के बाद एक बार फिर सभी की नजरों में आ गए हैं, फर्क बस इतना है कि इस बार मामला किसी लोकल टूर्नामेंट का नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवा भारतीय टीम को जीत दिलाने का था जिससे उनके प्रदर्शन की अहमियत और बढ़ जाती है।
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