विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 29, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

तेज भागती जिंदगी में मोबाइल बना दोस्त, बचपना खो रहा 'बचपन'

By Kajal KumariEdited By:
Published: Wed, 29 Nov 2017 03:53 PM (IST)Updated: Wed, 29 Nov 2017 09:53 PM (IST)

बच्चों के हाथ में जन्म के कुछ माह बाद ही मोबाइल थमा दिया जाता है। बच्चे आज बाहर खेलना नहीं ...और पढ़ें

तेज भागती जिंदगी में मोबाइल बना दोस्त, बचपना खो रहा 'बचपन'
तेज भागती जिंदगी में मोबाइल बना दोस्त, बचपना खो रहा 'बचपन'

मुजफ्फरपुर [जेएनएन]। तेज रफ्तार से दौड़ती-भागती जिंदगी में मां-बाप दोनों कामकाजी...नतीजा एकाकी होते बच्चे। बच्चे अकेलापन महसूस न करें, इसलिए थमा दिए जाते स्मार्ट फोन और लैपटॉप। कठिन से कठिन सवालों के जवाब तो इंटरनेट के पास है।

मगर 11-12 की उम्र में भावनात्मक प्रेम और भटकाव से रोकने के उपाय तो अभिभावक के पास ही है। इस कमी की वजह से बच्चे खो रहे बचपना। मां-बाप को एहसास तो है, लेकिन मजबूर हैं...। 

 

छह वर्ष की नेहा मोबाइल के बिना नहीं रह पाती और रो-रो कर बुरा हाल कर लेती है। पिता नरेश कुमार व मां ममता कुमारी नेहा की इस आदत से परेशान हैं। दोनों उस दिन को कोसते हैं, जब उन्होंने भाग-दौड़ की परेशानी से बचने के लिए मोबाइल थमा दिया था।

 

पांच साल के आशीष को खाना तभी पसंद है, जब मोबाइल पर कोई गेम चलता रहता है। आठवीं के छात्र अभि दोस्तों के बीच मोबाइल मास्टर के नाम से चर्चित है। सोशल साइट्स से लेकर मोबाइल के सभी एप्लिकेशन पर उसे कमांड है। इस विशेषज्ञता ने उसे परिवार से दूर कर दिया है।

 

माता-पिता व भाई-बहन के साथ वह खुद को उतना सहज महसूस नहीं करता, जितना मोबाइल के साथ। ये उदाहरण उन बच्चों के हैं जिनके माता-पिता नौकरी की वजह से उन्हें समय नहीं देने पा रहे हैं। मगर, अब वे बच्चों के मोबाइल एडिक्ट होने का खमियाजा भुगत रहे हैं।

 

बच्चे अब उनसे ज्यादा मोबाइल के करीब हो गए हैं। रिश्ते बस नाम के, क्योंकि रिश्तों का एहसास बच्चों को नहीं है। नानी-दादी की कहानी से वे वंचित हैं। पिता की मार से बचाने अब बुआ नहीं आतीं। मामी को कब देखा याद नहीं। 

 

 

खत्म होते संयुक्त परिवार ने बढ़ाई परेशानी

आधुनिकता की अंधी दौड़ में संयुक्त परिवार की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। परिवार माता-पिता व बच्चे तक सिमट गया। बच्चों को दादा, दादी, चाचा-चाची, नाना-नानी व अन्य का साथ नहीं मिल पाता। माता-पिता अगर जॉब कर रहे तो वो बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी सही से नहीं निभा पाते। बच्चे परेशान न करें वे उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं, जो बाद में विस्फोटक हो जाता है। 

 

 

नीतीश्वर सिंह महाविद्यालय में स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डा. रंजना सिन्हा ने कहा कि बच्चों की निगरानी आवश्यक है। माता-पिता व्यस्तता की वजह से ऐसा नहीं कर पाते। एकाकी परिवार होने की वजह से अन्य सदस्यों का भी सहयोग नहीं मिल पाता। ऐसे में बच्चों के लिए रिश्तों की अहमियत खत्म होती जाती है। वे अपनी दुनिया में ही जीना चाहते हैं। 

 

स्थिति भयावह, नियंत्रण मुश्किल

मनोचिकित्सक डॉ. संजय कुमार की मानें तो स्थिति भयावह हो चुकी है। डॉ. कुमार कहते हैं कि मोबाइल अब नशा का रूप ले चुका है। खासकर सोशल साइट्स व अन्य गेम। किशोर व किशोरी एक पोस्ट डालने के बाद बार-बार उसमें जाकर 'लाइक' देखते हैं। कम मिले तो हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं।

 

मैदान पर कम होते बच्चे इसका उदाहरण है। उन्हें इंडोर या आउटडोर गेम में मन नहीं लगता। घर में माता-पिता के साथ भले बैठा हो, उनसे बातें कम। वास्तविक संबंधों को दरकिनार कर काल्पनिक दुनिया में अधिक सहज महसूस कर रहे हैं। यह स्थिति अब नियंत्रण से बाहर जा रही है। इसके लिए चिकित्सक से अधिक अभिभावक को बच्चों पर समय देने की जरूरत है।

 

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।