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सिंधु जल विवाद: कंगाली के बीच हेग कोर्ट में PAK ने लुटाए 60 लाख डॉलर, भारत के हिस्से का पैसा भी खुद भरा

Published: Sat, 10 Oct 2026 10:49 AM (IST)

पाकिस्तान गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद हेग कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भारत के खिलाफ जल विवाद पर $6 मिलियन खर्च कर चुका है।

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डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तान गंभीर आर्थिक तंगी और कड़े ऑस्टेरिटी ड्राइव से जूझ रहा है। एक तरफ जहां अपने नागरिकों को बुनियादी सहूलियतें देने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ नीदरलैंड्स के द हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भारत के खिलाफ कानूनी लड़ाई पर पानी की तरह पैसा बहा रहा है।

पाकिस्तान के वर्ष 2026-27 के आधिकारिक बजट दस्तावेजों से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस्लामाबाद ने सिंधु जल विवाद, भारत की रतले और किशनगंगा जलविद्युत परियोजनाओं पर अपनी आपत्तियों को लेकर अब तक इस अंतरराष्ट्रीय अदालत में करीब 6 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि इस भारी-भरकम रकम में वह हिस्सा भी शामिल है, जो मध्यस्थता अदालत द्वारा भारत की तरफ से मांगा गया था लेकिन पाकिस्तान ने उसे भी अपनी जेब से चुकाया।

भारत का हिस्सा भी खुद भर रहा है पाकिस्तान

भारत इस पूरी कानूनी प्रक्रिया से शुरू से ही दूर रहा है। भारत सरकार का स्पष्ट रुख रहा है कि वह द हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को मान्यता नहीं देता है।

भारत ने न तो इस मुकदमे में भाग लिया है और न ही अदालत द्वारा मांगी गई फीस जमा की है। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इस कार्यवाही को जारी रखने के लिए भारत के हिस्से का बकाया पैसा भी खुद अपनी जेब से चुकाया है।

इसके अलावा, पाकिस्तान ने विश्व बैंक द्वारा नियुक्त न्यूट्रल एक्सपर्ट की कार्यवाही के लिए भी लगभग 1.94 मिलियन डॉलर का भुगतान किया है।

साल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जब भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया और न्यूट्रल एक्सपर्ट की बैठकों से दूरी बना ली, उसके बावजूद पाकिस्तान लगातार भारत के हिस्से का वित्तीय योगदान जमा कराता रहा है।

घरेलू बाढ़ राहत से छह गुना अधिक बजट केस पर खर्च

पाकिस्तान के बजट आंकड़ों से देश की जल प्राथमिकताओं का विरोधाभास साफ नजर आता है। वित्त वर्ष 2026-27 में जल संसाधन विभाग के कुल 15.3 मिलियन डॉलर के बजट में से आधे से भी ज्यादा यानी लगभग 7.9 मिलियन डॉलर, पाकिस्तान मिशन फॉर इंडस वाटर्स को आवंटित किए गए हैं। यह वही संस्था है जो भारत के खिलाफ केस की पैरवी कर रही है।

इसके विपरीत, देश के भीतर बाढ़ प्रबंधन और जल संरक्षण की देखरेख करने वाले केंद्रीय बाढ़ आयोग के कार्यालय को महज 1.2 मिलियन डॉलर दिए गए हैं।

इसका सीधा मतलब यह है कि पाकिस्तान ने अपने देशवासियों को बाढ़ से सुरक्षा देने और जल बुनियादी ढांचे को सुधारने की तुलना में अंतरराष्ट्रीय मुकदमेबाजी पर छह गुना से भी ज्यादा रकम खर्च करने का फैसला किया है।

जनता पर पाबंदियां लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनी जंग जारी

यह भारी-भरकम खर्च ऐसे समय में हो रहा है जब पाकिस्तान सरकार ने 17 सितंबर को कड़े बचत अभियान की घोषणा की है। इस अभियान के तहत सरकारी वाहनों के ईंधन आवंटन में आधी कटौती कर दी गई है, नई गाड़ियां खरीदने पर रोक लगा दी गई है, और विदेशी दौरों व सरकारी दावतों पर पाबंदी लगा दी गई है।

इसके साथ ही, गैर-कर्मचारी खर्चों में 5% की कटौती की गई है और प्रांतीय व संघीय स्तर की कई विकास परियोजनाओं के बजट को रोक दिया गया है।

इन कड़े बचत नियमों के बावजूद, द हेग में पाकिस्तान का खर्चीला अभियान बिना किसी बाधा के चल रहा है। करीब 7.2 मिलियन डॉलर की राशि को बजट में सामान्य परिचालन खर्च के तहत दिखाया गया है, जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि इसमें से कितना पैसा अंतरराष्ट्रीय मुकदमेबाजी में इस्तेमाल होगा।

लंदन की महंगी लॉ फर्मों पर बेहिसाब खर्च

पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय वकीलों की टीम पर खर्च की जा रही रकम को लेकर भी पारदर्शिता की भारी कमी है। द हेग में केस लड़ने के लिए पाकिस्तान ने लंदन की जानी-मानी लॉ फर्मों और शीर्ष बैरिस्टरों की एक बड़ी टीम तैनात की है, जिसमें 20 एसेक्स और फिएटा एलएलपी जैसी फर्मों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इन वकीलों और तकनीकी सलाहकारों को दी जाने वाली फीस का कोई सार्वजनिक ब्योरा पेश नहीं किया गया है।

ब्रिटेन के कानूनी क्षेत्र के तय मानकों से संकेत मिलता है कि यह खर्च काफी ज्यादा है। लंदन में वाणिज्यिक मामलों के किसी वरिष्ठ वकील की फीस 579 पाउंड से लेकर 925 पाउंड प्रति घंटा तक होती है, जबकि किसी किंग्स काउंसिल की केस फीस ही 140158 पाउंड तक पहुंच जाती है।

अगस्त 2016 से चल रही इस लंबी मुकदमेबाजी में वकीलों की फीस, विशेषज्ञों की रिपोर्ट, यात्रा और ठहरने पर भारी-भरकम रकम खर्च की जा चुकी है।

घरेलू जल संकट से ध्यान भटकाने की कोशिश

जानकारों का मानना है कि द हेग में दोहरा मुकदमा चलाकर पाकिस्तान सरकार देश के भीतर गलत धारणा बनाए रखना चाहती है कि जल सुरक्षा को खतरा केवल सीमा पार से है।

यह कदम दशकों से चली आ रही खराब जल प्रबंधन नीति, पानी की बर्बादी और प्रशासनिक नाकामी से जनता का ध्यान भटकाने का काम करता है।

पाकिस्तान में समय पर रख-रखाव न होने के कारण तरबेला, मंगला, चश्मा और वारसक जैसे चार प्रमुख जलाशयों की जल भंडारण क्षमता में 29 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है।

अपने ही जल संसाधनों की बदहाली को सुधारने के बजाय पाकिस्तान सरकार राष्ट्रीय त्याग की दुहाई देकर द हेग अभियान पर करोड़ों डॉलर गंवा रही है।

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