बिजली-पानी, महंगाई और गरीबी से बेहाल... रहमान सरकार के खिलाफ सड़कों पर जनता, बांग्लादेश में क्यों लग रहे भारत विरोधी नारे?
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में बिजली संकट, महंगाई और गरीबी के खिलाफ तारिक रहमान सरकार के विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।

बांग्लादेश में रहमान सरकार के खिलाफ सड़कों पर जनता, रैली में लगे भारत विरोधी नारे(फोटो: सोशल मीडिया)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, ढाका। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में एक बार फिर भारत विरोधी नारेबाजी देखने को मिली है। देश में गहराते बिजली संकट, ईंधन-गैस की किल्लत और लगातार बढ़ती महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं।
इसी कड़ी में नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के संयोजक नाहिद इस्लाम के नेतृत्व में शुक्रवार को ढाका के राष्ट्रीय संग्रहालय के सामने एक विशाल विरोध रैली निकाली गई, जिसमें सरकार के गृह मंत्री और ऊर्जा मंत्री के इस्तीफे की मांग की गई।
रैली में गूंजें दिल्ली ना ढाका के नारे
घरेलू मुद्दों को लेकर बुलाई गई इस रैली में एक बार फिर भारत विरोधी भावनाएं हावी नजर आईं। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में एनसीपी नेता मंच से 'दिल्ली ना ढाका' का नारा लगाते दिखे, जिसके जवाब में रैली में मौजूद हजारों लोगों की भीड़ ढाका, ढाका के नारे लगाती सुनाई दी।
इस प्रदर्शन में कट्टरपंथी एनसीपी सांसद हसनत अब्दुल्ला भी मौजूद रहे, जिन्होंने पिछले साल भारत के सेवन सिस्टर्स को मुख्य भूमि से अलग करने और संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक को लेकर भड़काऊ बयान दिया था।
गंगा जल समझौते की चेतावनी
रैली को संबोधित करते हुए नाहिद इस्लाम ने बिना किसी ठोस सबूत के भारत पर बांग्लादेश के खिलाफ साजिश रचने का पुराना राग अलापा। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा सरकार देश को इन कथित साजिशों से बचाने में सक्षम नहीं है।
साथ ही, उन्होंने सीमा पर मौतों का जिक्र करते हुए असम और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के उत्पीड़न तथा दिल्ली में मस्जिदों को गिराने की कथित योजना के दावे किए, हालांकि इन बातों के समर्थन में उन्होंने कोई साक्ष्य पेश नहीं किया।
इसके अतिरिक्त, नाहिद ने चेतावनी दी कि यदि 30 साल पुराने गंगा जल बंटवारा समझौते पर बांग्लादेश के पक्ष में न्यायसंगत तरीके से फिर से बातचीत नहीं की गई, तो वे दोबारा सड़कों पर उतरेंगे।
पश्चिम बंगाल के फरक्का बैराज पर पानी के बंटवारे से जुड़ा यह समझौता दिसंबर में समाप्त हो रहा है। पद्मा यानी गंगा नदी बांग्लादेश की लगभग एक-तिहाई आबादी की आजीविका की जीवनरेखा मानी जाती है।
शेख हसीना के हटने के बाद बढ़ा भारत विरोधी माहौल
अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से बांग्लादेश में भारत विरोधी बयानबाजी लगातार बढ़ी है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान ऐसे बयानों में काफी तेजी आई थी, जहां कई छात्र और राजनीतिक नेताओं ने तीखी टिप्पणियां की थीं।
हालांकि, फरवरी में तारिक रहमान की बीएनपी सरकार के सत्ता में आने के बाद कुछ समय के लिए ये बयान शांत हुए थे, लेकिन अब घरेलू संकट गहराते ही राजनीतिक दल फिर से भारत विरोध को हवा देने में लग गए हैं।
बिजली कटौती, कमरतोड़ महंगाई और गरीबी से लोग बेहाल
बांग्लादेश इस समय गंभीर ऊर्जा और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश अपनी जरूरत का 90% से अधिक तेल और 30% गैस आयात करता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते आयातित गैस की कीमतें बढ़ गई हैं और आपूर्ति पर भारी असर पड़ा है।
कई इलाकों में लगातार हो रही बिजली कटौती ने बांग्लादेश की रीढ़ माने जाने वाले गारमेंट फैक्ट्रियां में उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
इसके अलावा, विश्व बैंक के अनुसार मुद्रास्फीति करीब 8.5% बनी हुई है, जिससे खाने-पीने और जरूरी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में 21 लाख से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं, जिसने मध्यम और निम्न वर्ग में सरकार के खिलाफ नाराजगी भर दी है।
प्रधानमंत्री आवास घेरने की धमकी
जनता के इसी गुस्से को भुनाते हुए एनसीपी ने गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद और ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद तुकू के इस्तीफे की मांग की है। नाहिद इस्लाम ने चेतावनी दी कि यदि दोनों मंत्रियों ने पद नहीं छोड़ा, तो देशव्यापी आंदोलन चलाकर प्रधानमंत्री तारिक रहमान के आवास का घेराव किया जाएगा।
एनसीपी सांसद अख्तर हुसैन ने सवाल उठाया कि कोलकाता की तुलना में बांग्लादेश में एलपीजी सिलेंडर दोगुने से ज्यादा दाम पर क्यों बिक रहा है। वहीं, नाहिद इस्लाम ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नया तानाशाह बताते हुए आरोप लगाया कि वे लंदन से लूटपाट और भ्रष्टाचार की योजना लेकर आए हैं।
हालांकि यह विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से सरकार की नाकामियों और आर्थिक तंगी के खिलाफ था, लेकिन इसमें भारत विरोधी नारों का उभरना यह साफ करता है कि पड़ोसी देश की राजनीति में अब भी भारत विरोध का इस्तेमाल एक प्रमुख हथियार के रूप में किया जा रहा है।
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