'हर तरफ सिर्फ दिखावा', अमेरिकी बॉन्ड के 'Safe-Haven' टैग पर ईरान ने कसा तंज
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघर गालिबफ ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड को 'दिखावा' बताया। उन्होंने वैश्विक निवेशकों की इस धारणा ...और पढ़ें

ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघर गालिबफ की फाइल फोटो। (सोर्स - सोशल मीडिया)
HighLights
ईरानी स्पीकर ने अमेरिकी बॉन्ड को 'दिखावा' कहा
भू-राजनीतिक तनाव में सुरक्षा पर सवाल उठाए
निवेशकों की आदत और भावना पर आधारित बताया
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघर गालिबफ ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर तंज कसते हुए कहा, यह सिर्फ दिखावा है और बस कागज पर सही लगती है। उन्होंने X पर पोस्ट करके वैश्विक निवेशकों की इस पुरानी धारणा पर सवाल उठाया है कि, भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड ही सबसे सुरक्षित निवेश हैं।
जबकि अपनी पोस्ट में उन्होंने आगे कहा, होर्मुज स्ट्रेट में जोखिम कम होने के दौरान, डिजिटल तेल में उतार-चढ़ाव के आधार पर ट्रेडिंग करना, ट्रेजरी बॉन्ड में उतार-चढ़ाव के आधार पर हेजिंग करने जैसा है। दोनों में एक ही बात समान है जो कागज पर सही लगती है। अंतर यह है कि तेल के लिए कम से कम डेटेड ब्रेंट रेटिंग है, लेकिन ट्रेजरी बॉन्ड के लिए कुछ नहीं है।
वैश्विक अनिश्चितता के दौरान बढ़ जाती है डिमांड
उनका तर्क है कि निवेशकों का अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्डों की ओर रुख करना अक्सर ठोस आंकड़ों की तुलना में आदत और भावनाओं से अधिक प्रेरित होता है। गालिबफ इसकी तुलना डेटेड ब्रेंट से करते हैं, जो उत्तरी सागर के भौतिक तेल भंडारों का बेंचमार्क है। भले ही व्यापारी तेल बाजार में सट्टा लगाते हों, फिर भी एक वास्तविक, भौतिक बाजार होता है जो कीमतों को स्थिर रखता है। गालिबफ का सुझाव है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्डों में ऐसा कोई भौतिक आधार नहीं होता है और इनकी कीमत मुख्य रूप से अपेक्षाओं, नीतिगत संकेतों और सामूहिक बाज़ार विश्वास पर आधारित होती है।
बता दें कि, इस पोस्ट में वैश्विक अनिश्चितता के दौरान, निवेशक आमतौर पर इक्विटी बेचते हैं और अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा जारी किए गए बॉन्ड खरीदते हैं। इसको लेकर तर्क दिया गया है। इसके अलावा ऐसा कहा जाता है कि, अमेरिकी सरकार के दिवालिया होने की संभावना कम मानी जाती है, और उसके बॉन्ड अत्यधिक तरल हैं।
यह पैटर्न दशकों से युद्धों, वित्तीय संकटों और बाजार में आई गिरावट के दौरान दोहराया जाता रहा है। गालिबफ की टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि, वह इस बात पर सवाल उठा रहें हैं कि क्या यह व्यवहार वित्तीय बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है या केवल लंबे समय से चली आ रही बाज़ार की मानसिकता पर।
