ईरान ने किया सऊदी अरब में अमेरिकी एयरबेस पर हमले का दावा, E-3 सेंट्री विमान हुआ नष्ट
ईरान ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। ईरानी मीडिया का दावा ...और पढ़ें

सऊदी एयरबेस पर हमले में अमेरिका का E-3 सेंट्री क्षतिग्रस्त(फोटो: सोशल मीडिया)
HighLights
ईरान ने प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर मिसाइल-ड्रोन हमला किया
अमेरिकी E-3 सेंट्री AWACS विमान को भारी नुकसान का दावा
हमले में 12 अमेरिकी सैनिक घायल, कई टैंकर विमान क्षतिग्रस्त
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरान ने शुक्रवार को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर मिसाइल और ड्रोन से बड़ा जवाबी हमला किया। ईरानी मीडिया का दावा है कि इस हमले में अमेरिका का अत्याधुनिक E-3 सेंट्री AWACS विमान काफी हद तक नष्ट हो गया।
ईरान की सरकारी चैनल प्रेस टीवी ने हमले की तस्वीरें जारी की हैं, जिनमें विमान का मुख्य शरीर पूरी तरह तबाह दिख रहा है, जबकि आगे का हिस्सा और पूंछ बची हुई है।
हमले में क्या हुआ?
NDTV के रिपोर्ट्स के अनुसार, हमले में 6 बैलिस्टिक मिसाइलें और 29 ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। अमेरिकी सूत्रों ने बताया कि हमले में कम से कम 12 अमेरिकी सैनिक घायल हुए, जिनमें से दो की हालत गंभीर है। इसके अलावा कई एयर रिफ्यूलिंग विमान (KC-135 टैंकर) भी क्षतिग्रस्त हुए।
ई-3 एडब्ल्यूएसीएस विमान अमेरिकी वायुसेना की कमान और नियंत्रण प्रणाली की रीढ़ माना जाता है। यह हवा में उड़ते हुए दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और ड्रोनों की निगरानी करता है। इसका नुकसान अमेरिका के लिए बड़ा झटका है क्योंकि ऐसे विमान सीमित संख्या में उपलब्ध हैं।
ईरान का मिसाइल और ड्रोन से हमले का दावा
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने लंबी और मध्यम दूरी की मिसाइलों तथा हमलावर ड्रोनों का इस्तेमाल किया। ईरान ने यह भी दावा किया कि उसने एक अमेरिकी MQ-9 ड्रोन मार गिराया और एक F-16 जेट को निशाना बनाया। ईरान इसे अमेरिका और इजराइल के हमलों का जवाब बताया है।
यह हमला 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध के दूसरे महीने में हुआ है। युद्ध की शुरुआत में इजराइली हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई और सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी समेत कई शीर्ष अधिकारी मारे गए थे। ईरान ने इन हमलों को बिना उकसावे का युद्ध करार दिया है।
बुनियादी ढांचे पर हमला
युद्ध में नागरिक बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हुआ है। शनिवार को ईरान के बूशहर प्रांत में एक परिवार के चार सदस्य मारे गए, जबकि खुजिस्तान में पानी की सुविधा को निशाना बनाया गया। तेहरान में रविवार सुबह विस्फोटों में दो लोगों की मौत हुई और पांच घायल हुए।
ईरानी सेना ने दावा किया कि उसने हाइफा में इजराइली रक्षा कंपनी एल्टा के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सेंटर और बेन गुरियन एयरपोर्ट के फ्यूल स्टोरेज को भी निशाना बनाया। यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने अभी तक हमले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हमला क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है और मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को जटिल बना रहा है।
क्या है AWACS?
युद्ध क्षेत्र को मैनेज करने और सैकड़ों किलोमीटर दूर से ड्रोन, मिसाइलों और विमानों को ट्रैक करने में E-3 सेंट्री या AWACS बहुत अहम है। US Air Force के अनुसार, यह असल में एक बदला हुआ Boeing 707/320 कमर्शियल एयरफ्रेम है और इसमें एक घूमने वाला रडार डोम लगा होता है।
US Air Force ने बताया कि इस रडार की रेंज 375km (250 मील) से ज्यादा है, जिससे यह दोस्त, न्यूट्रल और दुश्मन की गतिविधियों के बारे में जानकारी, और अपनी जिम्मेदारी वाले इलाके पर कमांड और कंट्रोल दे पाता है।
1977 में US सेना में शामिल किया गया यह विमान कि युद्ध क्षेत्र की हर ऊंचाई और हर मौसम में निगरानी करता है, और साझा, सहयोगी और गठबंधन वाले ऑपरेशन्स के दौरान दुश्मन की हरकतों की पहले से चेतावनी देता है।
US Air Force की ऑफिशियल वेबसाइट पर विमान के बारे में छपी जानकारी से यह भी पता चलता है कि इसमें बिना रीफ्यूलिंग के लगातार आठ घंटे तक मिशन करने की क्षमता है। उड़ते समय रीफ्यूलिंग करके इसकी रेंज और हवा में रहने का समय बढ़ाने की भी गुंजाइश है।
E-3 में ऐसा क्या खास है?
मिलिट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार, जंग में E-3 विमानों का नुकसान US के ईरान पर हवाई हमलों में बड़ी कमियां पैदा कर सकता है। डिफेंसिव असिस्टेंट्स और स्टिम्सन सेंटर थिंक टैंक के सीनियर फेलो केली ग्रीको ने शनिवार को एयर एंड स्पेस फोर्सेज मैगजीन को बताया कि कम समय के लिए, जंग में यह एक बड़ा नुकसान है।
यह हमला ईरान की असिमेट्रिक वॉरफेयर की रणनीति को भी दिखाता है, जिसमें तेहरान ने प्रॉक्सी नेटवर्क, ड्रोन के झुंड, मिसाइलों की भारी बौछार और साइबर ऑपरेशन्स का इस्तेमाल करके वाशिंगटन की हवाई ताकत को कमज़ोर करने पर ध्यान दिया है।
इसने असल में होर्मुज जलडमरूमध्य को भी ब्लॉक कर दिया है, जिससे दुनिया का 20 प्रतिशत तेल और गैस गुज़रता है। इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं, जो युद्ध से पहले की कीमतों से लगभग 40 प्रतिशत ज़्यादा है।
