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दो चुनाव, दो झटके और एक अनसुलझा युद्ध: ट्रंप की हार और नेतन्याहू की मुश्किलों के बीच ईरान युद्ध का क्या होगा?

Published: Wed, 04 Nov 2026 08:53 PM (IST)

अमेरिकी मिडटर्म में ट्रंप की हार और इजरायल में नेतन्याहू के सत्ता संघर्ष ने ईरान के खिलाफ उनकी साझेदारी को संकट में डाल दिया है।

दोनों नेताओं पर राजनीतिक दबाव का ईरान युद्ध पर असर।

दोनों नेताओं पर राजनीतिक दबाव का ईरान युद्ध पर असर।

HighLights

  1. अमेरिकी मिडटर्म में ट्रंप ने कांग्रेस पर नियंत्रण खोया।

  2. इजरायली चुनावों बाद नेतन्याहू सरकार बनाने में संघर्ष कर रहे।

  3. दोनों नेताओं पर राजनीतिक दबाव, ईरान युद्ध का भविष्य अनिश्चित।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स को मिली जीत के बाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का कांग्रेस पर नियंत्रण खत्म हो गया है।

वहीं 27 अक्टूबर को हुए चुनावों के बाद इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू संसद में बहुमत हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ईरान के खिलाफ शुरू किए गए व्यापक सैन्य अभियान में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले ये दोनों शीर्ष नेता अब अपने-अपने मुल्कों में गंभीर राजनीतिक संकट से घिर चुके हैं।

तेहरान में अयातुल्ला अली खमेनेई के मारे जाने के कई महीने बीतने के बाद भी यह संघर्ष किसी निर्णायक मुकाम पर नहीं पहुंच सका है। न तो युद्धक्षेत्र में कोई स्थायी विजय मिली है और न ही कूटनीतिक मेज पर शांति का कोई रास्ता निकला है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन दोनों नेताओं के बीच की यह साझेदारी अब किस दिशा में जाएगी? क्या ये राजनीतिक झटके उन्हें ईरान के साथ किसी समझौते की ओर ले जाएंगे, या फिर वे और भी सख्त रुख अपनाएंगे?

ट्रंप को मिडटर्म चुनाव में झटका

मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने वाशिंगटन की सत्ता का गणित पूरी तरह बदल दिया है। डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है।

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार डेमोक्रेट्स ने सीनेट की कम से कम सात सीटें जीती हैं, जिनमें कंसास, आयोवा, टेक्सास, ओहियो, मेन, नॉर्थ कैरोलिना और साउथ कैरोलिना शामिल हैं।

डेमोक्रेट्स ने दो दर्जन से अधिक उन कांग्रेसनल जिलों पर कब्जा किया, जहां 2024 में ट्रंप ने दोहरे अंकों की बढ़त से जीत हासिल की थी। जनवरी 2027 में डेमोक्रेटिक नेता हकीम जेफ़रीज़ के अमेरिकी इतिहास के पहले अश्वेत स्पीकर बनने की प्रबल संभावना है।

जॉर्जिया में कीशा लांस बॉटम्स पहली अश्वेत महिला गवर्नर चुनी गईं। ओहियो में डॉ. एमी एक्टन ने ट्रंप समर्थित विवेक रामास्वामी को हराया, जबकि टेक्सास में जीना हिनोजोसा पहली लैटिना गवर्नर बनीं।

सुहास सुब्रमण्यम ने वर्जीनिया में अपनी सीट बरकरार रखी, पिया डंडिया ने फ्लोरिडा-22 से जीत दर्ज की और अरुणा मिलर मैरीलैंड की लेफ्टिनेंट गवर्नर के पद पर दोबारा चुनी गईं।

ट्रंप ने इस बात को खारिज कर दिया कि यह नतीजा उनके लिए कोई व्यक्तिगत झटका है। उन्होंने कहा कि वे खुद तो चुनाव मैदान में थे ही नहीं। उन्होंने कहा, 'मैं तो चुनाव मैदान में था ही नहीं, और अगर होता, तो हम भारी बहुमत से जीतते!'

लेकिन राजनीतिक सच्चाई यह है कि जनवरी से शुरू होने वाली नई कांग्रेस ट्रंप प्रशासन की नीतियों, सैन्य खर्चों और नियुक्तियों की गहन जांच करेगी।

क्या ईरान युद्ध के कारण ट्रंप को हुआ नुकसान?

चुनाव नतीजों और एग्जिट पोल्स से साफ है कि मतदाताओं की नाराजगी के केंद्र में महंगाई और ईरान युद्ध दोनों मौजूद थे।

रॉयटर्स के अनुसार 90 प्रतिशत मतदाताओं ने महंगाई को मुख्य मुद्दा माना और 66 प्रतिशत ने बढ़ती कीमतों के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया।

AP वोटर पोल के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत लोगों ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को गलत ठहराया। होर्मुज जलडमरुमध्य में तनाव के कारण कच्चे तेल और डीजल की कीमतों में उछाल ने सीधे अमेरिकी परिवारों के बजट पर चोट की।

जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार ने बताया, 'ट्रंप ने वादा किया था कि वे विदेशी सैन्य संघर्षों से दूर रहेंगे, लेकिन वेनेजुएला और ईरान में वे उलझ गए। ईरान के मोर्चे पर उन्हें कोई निर्णायक सैन्य या राजनीतिक जीत नहीं मिली।

अमेरिका एक ऐसे गतिरोध में फंस गया है जहां से न तो वह जीत सकता है और न ही आसानी से बाहर निकल सकता है। नई कांग्रेस ट्रंप के युद्ध संबंधी बजट और सैन्य फैसलों पर कड़ा अंकुश लगाएगी।'

मतदान से पहले भी होर्मुज पर हमले

मतदान से महज कुछ घंटे पहले, 2 नवंबर को अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरानी ठिकानों पर हमले किए। ईरानी मीडिया के अनुसार, केशम, हेंगाम द्वीप और बंदर अब्बास के पास धमाके सुने गए।

अमेरिकी अधिकारियों ने इसे 'रक्षात्मक' कदम बताते हुए कहा कि ईरान द्वारा तैयार की जा रही एक एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल साइट को निशाना बनाया गया था।

खुद ट्रंप ने इसे छोटा हमला करार दिया। वर्तमान में होर्मुज के मुहाने पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी है और एक अतिरिक्त अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है।

वहीं दूसरी ओर, कतर की मध्यस्थता में बैकचैनल वार्ताएं भी चल रही हैं। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर कालिबाफ ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने कोई रणनीतिक भूल की, तो उसे भयानक परिणाम भुगतने होंगे।

उन्होंने कहा, 'अमेरिकियों ने 'युद्ध नहीं' का संदेश दिया है, हम इसका समर्थन करते हैं, लेकिन अगर अमेरिकी सरकार जनता की इच्छा के खिलाफ गई तो उसे कड़े जवाब का सामना करना पड़ेगा।'

तेहरान व्यापक वार्ता से पहले नौसैनिक नाकेबंदी हटाने, तेल प्रतिबंधों में ढील और लेबनान में युद्धविराम चाहता है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान अपने पूरे परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और होर्मुज में सैन्य गतिविधियों को पूरी तरह बंद करे। उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने उम्मीद जताई है कि बातचीत से कोई रास्ता निकल सकता है।

इजरायल में नेतन्याहू की राह मुश्किल

27 अक्तूबर को इजरायल में हुए संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बड़ा झटका दिया है। 120 सीटों वाली नेसेट में नेतन्याहू के लिकुड नीत दक्षिणपंथी गठबंधन को महज 53 सीटें मिली हैं, जो 61 के जादुई आंकड़े से 8 सीटें दूर है।

गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं, जबकि अरब पार्टियों ने रिकॉर्ड 19 सीटों पर कब्जा किया है। लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ा एकल दल बनी हुई है, लेकिन सरकार बनाने का रास्ता साफ नहीं है।

बहुमत न मिलने से हताश नेतन्याहू ने अरब पार्टियों पर चुनाव चोरी करने और धोखाधड़ी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'आतंकवाद का समर्थन करने वाली अरब पार्टियों ने आपराधिक कृत्यों और अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए चुनाव चुराया है।'

विपक्षी नेता गादी आइसेनकोट ने नेतन्याहू के आरोपों को चुनाव परिणामों को अवैध ठहराने की साजिश बताया। राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भी पूरे समुदाय को लांछित करने के लिए प्रधानमंत्री की खिंचाई की। इजरायल के चुनाव आयोग ने भी चुनाव प्रक्रिया में किसी भी व्यवस्थित धांधली के दावों को खारिज कर दिया है।

क्या नेतन्याहू ने ट्रंप पर बनाया था नए हमलों का दबाव?

चुनाव में आए इस राजनीतिक गतिरोध के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या नेतन्याहू अपनी सत्ता बचाने के लिए युद्ध का दायरा बढ़ाना चाहते हैं?

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 2 नवंबर को राजनयिक सूत्रों ने खुलासा किया कि नेतन्याहू ने ट्रंप से अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के तुरंत बाद ईरान पर त्वरित और व्यापक हवाई हमले शुरू करने का आग्रह किया था। जानकारों का मानना है कि देश में सुरक्षा संकट गहराने से नेतन्याहू को विपक्षी दलों के साथ लेकर एक आपातकालीन राष्ट्रीय सरकार बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि सप्ताह के अंत में हुई बातचीत में ट्रंप ने किसी नए हमले की सीधी सहमति नहीं दी थी।

प्रोफेसर राजन कुमार का मानना है कि ट्रंप, नेतन्याहू के उस झांसे में आ गए जिसमें उन्हें लगा था कि ईरान के मसले को एक ही झटके में हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है, लेकिन इसने अमेरिका को एक अंतहीन दलदल में फंसा दिया।

अब आगे क्या होगा?

जनवरी 2027 से वाशिंगटन में ट्रंप को विरोधी डेमोक्रेटिक कांग्रेस का सामना करना होगा, जो युद्ध के औचित्य, खर्च और सैनिकों की तैनाती पर सवाल पूछेगी। दूसरी ओर, यरुशलम में नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के लिए सीमित समय है।

दोनों नेता यह जताना चाहते हैं कि कमान अभी भी उनके हाथों में है, लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों के हाथ बंध चुके हैं। आने वाले हफ्तों में यह तय होगा कि क्या कतर के जरिए चल रही अप्रत्यक्ष वार्ताएं किसी युद्धविराम समझौते में बदलती हैं, या फिर राजनीतिक दबाव से घिरे ये दोनों नेता अपनी साख बचाने के लिए पश्चिम एशिया को एक और विध्वंसक टकराव की आग में झोंकते हैं।

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