UN में पाकिस्तान के आर्म्स कंट्रोल प्रस्ताव पर भारत और इजराइल ने चलाया वीटो जैसा रुख, क्या है इसका मतलब?
भारत और इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और बेलारूस द्वारा पेश किए गए पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण संबंधी मसौदा प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।

भारत-इजरायल ने UN में पाक-बेलारूस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया

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डिजिटल डेस्क, न्यूयॉर्क। भारत और इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान और बेलारूस द्वारा पेश किए गए एक मसौदा प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया है। इस प्रस्ताव में क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण की मांग की गई थी।
इस प्रस्ताव पर भारत का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। 'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण: क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण' शीर्षक वाले इस मसौदा प्रस्ताव को सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति ने स्वीकार कर लिया। इसके पक्ष में 180 वोट पड़े, जबकि दो देशों ने इसके खिलाफ वोट किया और किसी ने भी मतदान से परहेज नहीं किया।
भारत-इजरायल ने UN में पाक प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से केवल भारत और इजरायल ने ही इस प्रस्ताव का विरोध किया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है, और इसे मुख्य रूप से क्षेत्रीय या उप-क्षेत्रीय ढांचे के जरिए से हल नहीं किया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली समिति के सामने भारत का रुख साफ करते हुए बेदी ने कहा, 'हम इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि इस मुद्दे को मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संदर्भों में देखा जाना चाहिए।' उन्होंने आगे कहा कि भारत का यह विरोध इस मामले पर उसके लगातार रहे रुख की तरह ही है।
भारत ने इस प्रस्ताव में की गई उस मांग पर भी सवाल उठाए, जिसमें संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग से ऐसे सिद्धांत तैयार करने को कहा गया है, जो पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण पर क्षेत्रीय समझौतों के लिए एक रूपरेखा दे सके।
भारत ने क्षेत्रीय हथियार नियंत्रण को वैश्विक मुद्दा बताया
बेदी ने कहा, 'हमने इस अनुरोध को कुछ हद तक उत्सुकता के साथ पढ़ा है।' उन्होंने बताया कि आयोग पहले ही संबंधित मुद्दों पर आम सहमति से तीन नतीजे निकाल चुका है।
इनमें 1993 में अपनाई गई क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण संबंधी दिशा-निर्देश और सिफारिशें, 1999 में तय किए गए पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण और निरस्त्रीकरण संबंधी दिशा-निर्देश और 2017 में पारंपरिक हथियारों से जुड़े व्यावहारिक विश्वास-निर्माण उपायों पर बनी सहमति शामिल हैं।
उन्होंने कहा, 'यानी जिस संस्था से अब 'शुरुआत से' काम शुरू करने के लिए कहा जा रहा है, वह इसी विषय पर पहले ही आम सहमति से तीन नतीजे दे चुकी है।'
आगे की चर्चाओं की जरूरत पर सवाल उठाते हुए बेदी ने कहा कि यह समझना मुश्किल है कि जिस मुद्दे पर पहले ही विचार-विमर्श हो चुका है, उसे फिर से क्यों उठाया जा रहा है, सिवाय इसके कि इसका मकसद संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण मशीनरी को किसी काम में उलझाए रखना हो।
भारत ने इस प्रस्ताव में क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर रक्षा क्षमताओं के बीच संतुलन बनाए रखने पर दिए गए जोर की भी आलोचना की। बेदी ने तर्क दिया कि यह दृष्टिकोण गलत तरीके से यह मान लेता है कि देशों के सुरक्षा हित केवल उनके आस-पास के भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं
उन्होंने कहा, 'यह मान लेना कि देशों की सुरक्षा चिंताएं बस उनकी क्षेत्रीय सीमाओं पर आकर खत्म हो जाती हैं, गलत है। ऐसा नहीं होता।'
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं अक्सर तय की गई संकीर्ण क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे तक जाती हैं। उन्होंने कहा कि किसी खास क्षेत्र या उप-क्षेत्र के भीतर सैन्य संतुलन बनाए रखने का विचार अव्यावहारिक है।
इस प्रस्ताव में तर्क दिया गया है कि पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण पर मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तरों पर काम किया जाना चाहिए, क्योंकि शीत युद्ध के बाद के दौर में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए पैदा हुए ज्यादातर खतरे उन्हीं देशों के बीच से आए हैं जो एक ही भौगोलिक क्षेत्र में स्थित हैं।
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