विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

H-1B वीजा से इमिग्रेशन और डिपोर्टेशन तक: ट्रंप से क्यों छिटक रहे भारतीय-अमेरिकी वोटर्स? मिडटर्म ने दिए संकेत

Published: Wed, 04 Nov 2026 08:36 PM (IST)

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की जीत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच ट्रंप प्रशासन की नीतियों, खासकर H-1B वीजा और आव्रजन प्रतिबंधों पर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

ट्रंप से क्यों छिटक रहे हैं भारतीय-अमेरिकी वोटर्स।

ट्रंप से क्यों छिटक रहे हैं भारतीय-अमेरिकी वोटर्स।

HighLights

  1. अमेरिकी मिडटर्म में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस पर नियंत्रण पाया।

  2. भारतीय-अमेरिकी मतदाता ट्रंप की नीतियों से असंतुष्ट दिख रहे।

  3. H-1B वीजा, आव्रजन प्रतिबंधों पर चिंताएं बढ़ीं समुदाय में।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिकी मिडटर्म चुनावों ने वाशिंगटन में राजनीतिक संतुलन बदल दिया है। डेमोक्रेट्स ने 'हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स' और 'सीनेट' दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है, जो राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। भारतीय-अमेरिकियों के लिए, इस नतीजे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन से उनकी जिंदगी पर असर डालने वाली नीतियों में कोई सार्थक बदलाव आएगा?

यह परिणाम ऐसे समय में आया है जब भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच इमिग्रेशन प्रतिबंधों, रोजहगार के अवसरों और अपनी पहचान तथा जुड़ाव को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। ये चिंताएं विशेष रूप से उन भारतीय पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो अमेरिकी तकनीकी कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा हैं। हालांकि, यह मुद्दा केवल कुशल प्रवासियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से प्रवासियों के साथ होने वाले बर्ताव से भी जुड़ा है।

यह बदलाव इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय-अमेरिकियों ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रति अधिक खुलापन दिखाया था। लेकिन, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसे नीतिगत बदलाव और राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने इस समर्थन की परीक्षा ली है।

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की जीत से ट्रंप के एजेंडे में क्या बदलाव आएंगे?

डेमोक्रेट्स की जीत ने उन्हें ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान पहली बार कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण दिला दिया है। नई कांग्रेस के पास प्रशासन की जांच करने, अधिकारियों को सुनवाई के लिए बुलाने, इमिग्रेशन नियमों के लागू होने की प्रक्रिया की समीक्षा करने और बजटीय फैसलों को चुनौती देने की अधिक शक्तियां होंगी।

आव्रजन प्रतिबंधों को लेकर चिंतित भारतीय-अमेरिकियों के लिए, यह प्रशासन के सामने एक राजनीतिक संतुलन के रूप में काम करेगा। डेमोक्रेटिक सांसद कुशल कारीगरों पर असर डालने वाले उपायों, जैसे- H-1B प्रायोजन और वीजा जांच के क्रियान्वयन पर सवाल उठा सकते हैं। हालांकि, कांग्रेस द्वारा पारित किसी भी विधेयक को वीटो करने की शक्ति अभी भी ट्रंप के पास है। उनके वीटो को पलटने के लिए डेमोक्रेट्स को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

इसलिए, इसका तत्काल प्रभाव यह होगा कि ट्रंप के लिए जांच-पड़ताल बढ़ जाएगी और विधायी माहौल अधिक कठिन हो जाएगा, इसका मतलब यह नहीं है कि उनका आव्रजन एजेंडा अपने आप वापस ले लिया जाएगा।

क्या भारतीय-अमेरिकी ट्रंप से दूर हो रहे हैं?

अक्टूबर 2026 में 'कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस' द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि ये चिंताएं किस तरह मतदाताओं की पसंद में झलक रही हैं।

7 से 27 अक्टूबर के बीच 'यूगव' के साथ मिलकर 1,000 भारतीय-अमेरिकी वयस्कों के बीच किए गए एक सर्वे में पाया गया कि 62% भारतीय-अमेरिकी नागरिक डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देना चाहते हैं, जबकि 19% रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देना चाहते हैं। वहीं, 12% लोग अभी तय नहीं कर पाए हैं कि वे किसे वोट देंगे। वोटिंग का यह विश्लेषण 861 अमेरिकी नागरिकों पर आधारित था।

कुछ ऐसे कारक जिनका भारतीयों पर पड़ा सीधा असर

H-1B प्रतिबंध: भारतीय पेशेवरों पर सीधा प्रहार

H-1B कार्यक्रम भारतीय-अमेरिकियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है, क्योंकि अमेरिका के तकनीकी और पेशेवर कार्यबल में इस समुदाय की मजबूत उपस्थिति है। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत सभी H-1B आवेदनों में से 69.9% भारत में जन्मे लोगों के थे।

ट्रंप प्रशासन ने इस कार्यक्रम को अधिक महंगा और चयनात्मक बनाने का प्रयास किया है। इसमें अमेरिका के बाहर रहने वाले कर्मचारियों से जुड़े कुछ नए H-1B आवेदनों के लिए 100,000 डॉलर के भुगतान की शर्त रखी गई थी, जिसमें कुछ विशेष छूट भी दी गई थीं। सितंबर 2026 में, ट्रंप ने इस प्रतिबंध को 12 महीने और बढ़ाकर 21 सितंबर 2027 तक कर दिया। हालांकि, संघीय अदालतों ने इसे लागू होने से रोक दिया है, और फिलहाल यह शुल्क नहीं लिया जा रहा है।

निर्वासन: कुशल प्रवासन के दायरे से बाहर भी सख्ती

प्रशासन की आव्रजन प्रवर्तन नीति ने उन भारतीयों को भी प्रभावित किया है जो कुशल-श्रमिक वीजा प्रणाली के दायरे में नहीं आते हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान, 104 भारतीय नागरिकों को लेकर अमेरिका से पहली निर्वासन उड़ान फरवरी 2025 में अमृतसर पहुंची। हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़े इन लोगों की तस्वीरें सामने आने पर भारत में काफी आलोचना हुई।

भारत सरकार ने वाशिंगटन के समक्ष इस बात पर चिंता जताई कि इन लोगों, विशेषकर महिलाओं को बेड़ियों और हथकड़ियों में क्यों रखा गया। विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2025 में 3,567 भारतीय नागरिकों को अमेरिका से वापस भेज दिया गया और 1 जनवरी से 22 जुलाई 2026 के बीच 1,273 और भारतीयों को वापस भेजा गया।

ये आंकड़े डिपोर्टेशन से जुड़े हैं; इन्हें कानूनी प्रवासियों या H-1B वीजा धारक कर्मचारियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, इन कार्रवाइयों ने भारतीय परिवारों और समुदायों के बीच इमिग्रेशन पर हो रही सख्त कार्रवाई को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, खासकर उन लोगों के लिए जिनके रिश्तेदार अमेरिका में रहते हैं।

नौकरियां, छंटनी और भारतीय IT कंपनियों की जांच

रोजगार से जुड़ी चिंताओं ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। अमेरिकी टेक्नोलॉजी सेक्टर में होने वाली छंटनी के कारण, H-1B वीजा धारक कर्मचारियों के पास कोई दूसरा योग्य नियोक्ता खोजने या अपना इमिग्रेशन स्टेटस बदलने के लिए बहुत कम समय बचता है। ऐसे में, विदेशी पेशेवरों के लिए नौकरी की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनका अमेरिका में रहना सीधे तौर पर उनके रोजगार से जुड़ा होता है।

प्रशासन की जांच का दायरा नियोक्ताओं तक भी फैल गया है। अक्टूबर 2026 में, अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ टेक्नोलॉजी कंपनियों को 'परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम' से निलंबित कर दिया। इनमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो और HCLTech जैसी भारतीय IT कंपनियां भी शामिल हैं।

इस कार्रवाई के चलते, ये कंपनियां अब रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के तहत न तो कोई नया आवेदन दाखिल कर सकती हैं और न ही पहले से लंबित आवेदनों पर आगे की प्रक्रिया पूरी कर सकती हैं।

अमेरिका-भारत संबंध: असंतोष का एक और कारण

अमेरिका-भारत संबंध भी भारतीय-अमेरिकियों के बीच चिंता का विषय बन गए हैं। नवंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच किए गए कार्नेगी के एक सर्वेक्षण से पता चला कि 55% लोगों ने द्विपक्षीय संबंधों को लेकर ट्रंप के तौर-तरीकों को नापसंद किया, जबकि 20% लोगों ने इसे सही माना। एक-चौथाई लोगों ने इस पर कोई राय नहीं दी।

व्यापार, टैरिफ और रणनीतिक सहयोग के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, खासकर उन लोगों के बीच जिनके दोनों देशों के साथ व्यावसायिक, पारिवारिक या पेशेवर संबंध हैं। इसलिए, भारत के प्रति प्रशासन का रवैया भी एक ऐसा कारक बन गया है जो ट्रंप के कार्यकाल के बारे में लोगों की धारणा को प्रभावित कर रहा है।

भारतीय मूल के उम्मीदवार: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में जीत और हार

चुनाव में कई भारतीय मूल के डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की, जबकि रिपब्लिकन विवेक रामास्वामी ट्रंप के समर्थन के बावजूद ओहियो गवर्नर की दौड़ हार गए। नतीजे भारतीय-अमेरिकियों की अमेरिकी राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की तस्वीर को जोड़ते हैं, लेकिन पार्टी लाइनों के विपरीत किस्मत के साथ।

डेमोक्रेट पिया डांडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से जीत हासिल की, जबकि सुहास सुब्रमण्यम ने वर्जीनिया के 10वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से फिर से चुनाव जीता। मैरीलैंड की लेफ्टिनेंट गवर्नर अरुणा मिलर ने भी डेमोक्रेटिक गवर्नर वेस मूर के साथ एक और कार्यकाल जीता।

रो खन्ना, अमी बेरा और प्रमिला जयपाल सहित अन्य प्रमुख भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसदों ने भी जीत हासिल की। भारतीय मूल के डेमोक्रेट्स की जीत के साथ-साथ रामास्वामी की हार भी इस संबंध में महत्वपूर्ण है, भले ही परोक्ष रूप से।

यह भी पढ़ें- US मिडटर्म चुनाव में भारतीय-अमेरिकियों का बजा डंका, कौन कहां से जीता? पूरी लिस्ट

 

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।