बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बावजूद हाशिए पर लेफ्ट-कांग्रेस, अब निकाय चुनावों में साख की परीक्षा
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कमजोर पड़ने के बावजूद वाममोर्चा और कांग्रेस अपनी राजनीतिक हैसियत नहीं बढ़ा पाए हैं।
-1793020233858_m.webp)
वाममोर्चा-कांग्रेस तृणमूल की कमजोरी का लाभ नहीं उठा पाए

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मिलन कुमार शुक्ला, कोलकाता। बंगाल में सत्ता परिवर्तन और तृणमूल कांग्रेस के कमजोर पड़ने के बावजूद माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चा और कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
विधानसभा चुनाव में तृणमूल की करारी हार और उसके बाद पार्टी में हुई टूट ने विपक्ष के लिए जगह जरूर बनाई, लेकिन इस खालीपन को भरने में दोनों दल अब तक सफल नहीं हुए हैं।
भाजपा राज्य की सत्ता पर काबिज है, जबकि तृणमूल विधानसभा में 80 सीटों के साथ प्रमुख विपक्षी दल है। ऐसे में वाममोर्चा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई जमीन वापस पाने के साथ यह साबित करना है कि वे राज्य की राजनीति में अब भी प्रासंगिक हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 207 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में 215 सीटें जीतने वाली तृणमूल इस बार 80 पर सिमट गई। इसके बावजूद माकपा को महज एक और कांग्रेस को दो सीटें मिलीं।
माकपा का मत प्रतिशत 4.45 और कांग्रेस का 2.97 प्रतिशत रहा। यानी तृणमूल के खिलाफ सत्ता-विरोधी माहौल का लाभ दोनों दलों को व्यापक स्तर पर नहीं मिला। भाजपा ने इस राजनीतिक बदलाव का सबसे बड़ा लाभ उठाया।
आंदोलन में मौजूदगी, चुनावी ताकत में कमी
वामपंथी संगठन बेदखली, हाकरों की आजीविका, संविदाकर्मियों की समस्याओं और कृषि संकट जैसे मुद्दों पर आंदोलन कर रहे हैं। किसान सभा गांवों में संपर्क बढ़ाने और आलू संकट जैसे सवालों पर लोगों को संगठित करने की कोशिश में है।
कांग्रेस भी अपने पुराने प्रभाव वाले जिलों में संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन सड़क पर सक्रियता और चुनावी समर्थन के बीच की दूरी अब भी दोनों दलों के लिए बड़ी समस्या है।
वाममोर्चे का पिछला अनुभव बताता है कि स्थानीय चुनावों में सीमित वापसी संभव है, लेकिन उसे विधानसभा स्तर की ताकत में बदलना अलग चुनौती है।
वर्ष 2022 के नगर निकाय चुनावों में वाममोर्चा ने लगभग 14 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और नदिया जिले की ताहेरपुर नगरपालिका में जीत दर्ज की थी।
इसके बाद भी 2026 के विधानसभा चुनाव में वह अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाया। कांग्रेस की चुनौती और बड़ी है, क्योंकि उसका मत प्रतिशत तीन प्रतिशत से भी नीचे रहा।
उपचुनावों में भी सीमित रही बढ़त
अक्टूबर में हुए नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनावों ने इस तस्वीर को और स्पष्ट किया। भाजपा ने दोनों सीटें बड़े अंतर से जीतीं। नंदीग्राम में भाजपा को 75.94 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस 19.25 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही। विधानसभा चुनाव की तुलना में कांग्रेस के मत प्रतिशत में यहां उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई।
लेकिन रेजिनगर में कांग्रेस को तीन प्रतिशत और माकपा को 1.85 प्रतिशत वोट ही मिले। भाजपा ने इस सीट पर 63.14 प्रतिशत मत हासिल किए।
ये नतीजे बताते हैं कि कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस को सीमित लाभ जरूर मिला है, लेकिन उसे राज्यव्यापी पुनरुत्थान का संकेत नहीं माना जा सकता। वहीं, वामदलों की सक्रियता भी अभी व्यापक जनसमर्थन में बदलती नहीं दिख रही है।
निकाय चुनावों में अग्निपरीक्षा, जनाधार लौटाने की चुनौती
बंगाल में निकाय चुनाव होने हैं। कोलकाता, हावड़ा समेत पांच नगर निकायों में चुनाव को लेकर तैयारियां जोरों पर है। नगर निकाय चुनाव दोनों दलों के लिए अपनी संगठनात्मक ताकत परखने का अवसर होंगे।
कोलकाता और हावड़ा सहित कई शहरी निकायों में चुनाव की तैयारियां चल रही हैं। स्थानीय स्तर पर सड़क, सफाई, पेयजल, नागरिक सुविधाओं और रोजगार जैसे मुद्दे उनके लिए जनसंपर्क का आधार बन सकते हैं।
कुछ वार्डों या निकायों में बेहतर प्रदर्शन से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ सकता है और संगठन को फिर खड़ा करने में मदद मिल सकती है। वाममोर्चा और कांग्रेस को पहले अपना संगठन मजबूत करना, नए मतदाताओं से जुड़ना और विश्वसनीय नेतृत्व सामने लाना होगा।
तृणमूल की कमजोरी ने उनके लिए अवसर पैदा किया है, लेकिन उस अवसर को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए केवल सत्ता-विरोधी माहौल पर्याप्त नहीं होगा। कुल मिलाकर दोनों दलों के लिए निकाय चुनावों में जनाधार लौटाने की चुनौती है।
