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थोड़े की जरूरत है... बंगाल में 'खेला होबे' या 'भय आउट', आखिरी चरण में कौन मरेगा बाजी?

By Ashutosh JhaEdited By: Garima Singh
Published: Mon, 27 Apr 2026 11:30 PM (IST)

पश्चिम बंगाल चुनाव के अंतिम चरण में ग्रेटर कोलकाता में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है। खामोश ...और पढ़ें

ममता बनर्जी, सुवेंदु अधिकारी

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आशुतोष झा, कोलकाता। थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है...हाल में हुए पांच राज्यों के चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले पश्चिम बंगाल में फिलहाल यह सटीक बैठ रहा है। आमने-सामने खड़े भाजपा और सत्ताधारी दल तृणमूल के बीच भी इस 'थोड़े' को पाने की कवायद तेज चल रही है। यह कोशिश सोमवार को खत्म चुनाव प्रचार के साथ बंद नहीं होगी, घर-घर दस्तक देकर आखिरी पल तक समर्थन जुटाया जाएगा क्योंकि खामोश(साइलेंट) वोटर की आवाज ही सबसे ज्यादा सुनी और महसूस की जाएगी।

भाजपा इसे अपने पक्ष में मान रही है क्योंकि पिछले चुनाव की तरह तृणमूल का 'खेला होबे' जैसा उत्साह गायब है। रणनीति का जिम्मा संभालने वाली आइपैक की टीम दृश्य से ओझल है और पंद्रह साल की सत्ताविरोधी लहर हर स्तर पर है और युवा सरकार के खिलाफ मुखर हैं। हालांकि महिलाएं खामोश हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विश्वसनीयता और माइक्रो मैनेजमेंट ने ऐसी स्थिति तैयार कर दी है कि बदलाव की संभावना को एक झटके में तृणमूल, वाम और कांग्रेस के स्थानीय नेता भी खारिज नहीं करते हैं।

आखिरी चरण की अग्निपरीक्षा 

23 अप्रैल को पहले चरण के मतदान में अभूतपूर्व वोटिंग के बाद सबकी नजर 29 को होने वाले आखिरी चरण के मतदान पर है। वैसे भी ग्रेटर कोलकाता का यही क्षेत्र जिसमें पांच जिले और कुल 142 सीटें हैं, जहां अगली सरकार की पटकथा लिखी जाएगी। पिछली बार भाजपा यहां सिर्फ 18 सीटें जीत पाई थी और उत्तर बंगाल में 59 सीटें जीतकर 77 पर रुक गई थी। इस बार उत्तर बंगाल में कांग्रेस ने भी दम लगाया है और इसका अर्थ यह हो सकता है कि वहां तृणमूल को कुछ और नुकसान हो तथा भाजपा को फायदा।

भाजपा के कुछ नेताओं का यह भी दावा है कि अल्पसंख्य प्रभाव वाली कुछ सीटों पर भी त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा बाजी मार सकती है। नाम न छापने की शर्त पर वाम के एक बड़े मुस्लिम नेता भी भाजपा के इस दावे से इत्तेफाक जताते हैं । ऐसे में दोनो मुख्यदलों के लिए ग्रेटर कोलकाता ही महत्वपूर्ण है जो यूं तो तृणमूल का मजबूत इलाका रहा है लेकिन सत्ताविरोधी लहर के कारण पार्टी सशंकित है।

'भय आउट, भरोसा इन' वाली पॉलिटिक्स 

प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत बड़े नेताओं की रैलियों और प्रचार सामग्रियों में भी शासन प्रशासन और विकास की कमी को ही रेखांकित किया जा रहा है। पीएम मोदी के बड़े बैनर के साथ 'भय आउट, भरोसा इन' जैसे नारे हाइलाइट किए जा रहे हैं। बस, सड़क, बिजली जैसे सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव, सरकारी कर्मचारियों लिए सातवें वेतन आयोग को लागू करने, पेशनधारियों के लिए महंगाई भत्ता लागू करने के मुद्दे प्रमुखता में हैं।

वस्तुत: ये सारे मुद्दे सीधे तौर पर राज्य के मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग से जुड़ते हैं। लेकिन जमीन पर जाकर पार्टी कार्यकर्ता इन मुद्दों को वोटरों के जेहन में कितना बिठा पा रहे है, वही चुनाव को भाजपा की ओर ले जाएगा। उत्तर 24 परगना और नदिया की सीमा पर बसे एक गांव मे ज्यादातर नर्सरी का काम होता है। काम में लगी कुछ महिलाएं चुनाव के भविष्य के बारे में पूछने पर कहती है- देखते हैं क्या होता है.।

क्या है जनता का मूड?

ममता सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के बारे में पूछने पर कहती है- हां हमें लाभ मिलता है। यह पूछने पर कि क्या भाजपा सरकार आने पर ज्यादा मिलेगा- वह आपस में बात करती हैं फिर मुस्कुराकर चुप रहती हैं । वह इससे ज्यादा बोलना ही नहीं चाहती हैं। उनकी खामोशी का रहस्य शायद मतगणना के दिन ही निकलेगा।

ममता समर्थक इसे अपने पक्ष में देख रहे हैं और भाजपा अपने पक्ष में। युवाओं का रोष है कि पढ़ाई के बाद भी उनके लिए नौकरी नही है। उद्योग नहीं है जहां रोजगार पैदा हो सके। गांव में अस्पताल तो है लेकिन डाक्टर की मौजूदगी सुनिश्चित नहीं है। पंद्रह साल के बाद भी यह कमी उन्हें परेशान कर रही है। पड़ोस में दूसरा गांव अल्पसंख्यक बहुल है और वहां मुखरता से ममता सरकार का बचाव करते हैं।

एक बुजुर्ग कहते हैं- अच्छा काम कर रही हैं ममता। लेकिन उससे एक किलोमीटर की दूरी पर ही मतुआ बहुल इलाके में स्थिति बदल जाती है। एसआईआर में कुछ वोट यहां भी कटे है और इस लिहाज से माना जा रहा था कि यहां भाजपा को नुकसान भी हो सकता है। लेकिन नाराजगी व्यक्तिगत तौर पर हो सकती है, पूरे समुदाय में नहीं। एक वृद्ध कहते है- वोट फिलहाल कट गया है लेकिन आगे जुड़ जाएगा। फिर से आवेदन किया जाएगा। यह बहुत सहजता से कहा जा सकता है कि मतुआ समुदाय का कम से कम 80 फीसद फिर से इकतरफा भाजपा के लिए वोट करेगा।

शांत हुआ चुनावी शोर 

पिछले दो दिनों में खुद मोदी और शाह की रैलियों के बाद यह समाज पूरी तरह आश्वस्त दिख रहा है। कोलकाता में 14 सीट है और पिछली बार सभी सीट तृणमूल के खाते में गई थी। इस बार सातवें वेतन आयोग का भाजपा का वादा और महिला सुरक्षा का मुद्दा उन्हें परेशान कर सकता है। शहरी महिलाएं ग्रामीण महिलाओं को मुकाबले मुखर हैं। यह आशा भी जतायी जा रही है कि सामान्यतया कम वोट करने वाला कोलकाता का प्रबुद्ध वर्ग भी निकलेगा। यह देखने की बात होगी कि वह बदलाव के लिए वोट करेगा या निरंतरता के लिए ।

भाजपा और तृणमूल की इस जंग में कांग्रेस और वाम के लिए बहुत स्थान नहीं है। हालांकि उत्तर बंगाल के मुर्शीदाबाद और मालदा में कांग्रेस थोड़ी मजबूत होती दिखी है जो तृणमूल की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। जबकि वाम की कोशिश इतनी है कि भाजपा समेत दूसरे दलों में गए उनके कुछ वोटर वापस आ जाएं। उनकी अगली लड़ाई की रणनीति चुनाव परिणाम के हिसाब से तय होगी।

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