यूं पड़ा 'चोर बागान' नाम: कभी चोरों-डकैतों का अड्डा था यह इलाका, अब कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध दुर्गा पंडालों में एक
उत्तर कोलकाता के चोर बागान नाम के पीछे डकैतों और अपराधियों का इतिहास जुड़ा है, जो कभी घना जंगल था। ...और पढ़ें

चोर बागान की दुर्गा पूजा और उसका इतिहास (फोटो- IANS)

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डिजिटल डेस्क, कोलकाता। उत्तर कोलकाता के चोर बागान क्षेत्र के नामकरण के पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख ऐतिहासिक और लोक-कथाएं जुड़ी हुई हैं। पहला, अपराधियों और डकैतों का इतिहास (सबसे प्रमुख कारण) ऐतिहासिक मान्यताओं और पुराने निवासियों (जैसे राजा राजेंद्र मल्लिक के वंशजों) के बयानों के अनुसार, आज जहां घना शहरी इलाका और पाश व घनी बस्तियां हैं, सदियों पहले वह एक घना जंगल और वनों से घिरा हुआ क्षेत्र था।
हुगली नदी या गंगा की ओर चढ़ावा (भेंट) लेकर जाने वाले तीर्थयात्री जब इस जंगल वाले इलाके से गुजरते थे, तो यहां सक्रिय रहने वाले डकैत व अपराधी उन पर हमला कर देते थे और उनका सामान लूट लेते थे। इस प्रकार, लगातार चोरों और डकैतों का अड्डा बने रहने तथा लूटपाट की घटनाओं के कारण इस जगह का नाम 'चोर बागान' (यानी चोरों का बाग/इलाका) पड़ गया।
बाद में जब ब्रिटिश काल के दौरान और उसके बाद यहां जंगल साफ हुए, तो कुलीन व प्रतिष्ठित परिवारों (जैसे मल्लिक परिवार, मित्र परिवार आदि) ने यहां आकर अपनी भव्य हथेलियां और मकान बनवाने शुरू किए। धीरे-धीरे यह एक संभ्रांत और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हो गया, लेकिन इसका पुराना ऐतिहासिक नाम 'चोर बागान' ही बना रहा।
चोर बागान की दुर्गा पूजा और उसका इतिहास
चोर बागान की दुर्गा पूजा कोलकाता की सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक सार्वजनिक (सार्वजनिक/बारोवारी) दुर्गा पूजा में से एक है। चोर बागान सार्वजनिन दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1938 में हुई थी। इस प्रकार यह पूजा लगभग 91 वर्षों से अधिक पुरानी अपनी समृद्ध परंपरा को संजोए हुए है।
उत्तर कोलकाता के इस संकरी गलियों और घनी आबादी वाले इलाके में होने के बावजूद, यह पूजा अपनी अनूठी कलात्मकता, भव्यता और सामाजिक संदेश देने वाली थीम के लिए पूरे शहर में प्रसिद्ध है। यहां हर साल दुर्गा पूजा के दौरान एक से बढ़कर एक नायाब थीम देखने को मिलती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से दर्शक पहुंचते हैं।
