बंगाल में ग्राम प्रधानों की वित्तीय शक्तियों पर लगाम, विधानसभा में पंचायत संशोधन विधेयक पारित
बंगाल विधानसभा में पंचायत संशोधन विधेयक पारित हो गया है, जिससे ग्राम प्रधानों की वित्तीय शक्तियां सीमित हो गई हैं।

बंगाल विधानसभा में पंचायत संशोधन विधेयक पारित
HighLights
बंगाल विधानसभा में पंचायत संशोधन विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ।
ग्राम प्रधानों की वित्तीय शक्तियां अब सीमित कर दी गई हैं।
विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का लक्ष्य।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद कई ग्राम प्रधानों के पंचायत कार्यालय नहीं आने और विकास कार्य प्रभावित होने के आरोपों के बीच राज्य सरकार ने उनकी वित्तीय शक्तियों को सीमित करने का फैसला किया है। इस संबंध में बजट सत्र के अंतिम दिन शनिवार को राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए पंचायत संशोधन विधेयक विधानसभा में पारित हो गया।
सदन में चर्चा के बाद ममता बनर्जी समर्थित तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने विधेयक पर मतदान की मांग की। मतदान में विधेयक के पक्ष में 169 वोट पड़े, जबकि 13 विधायकों ने विरोध में वोट किया। वहीं, 32 विधायक मतदान से दूर रहे।
विधानसभा में पंचायत संशोधन विधेयक पारित
विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष ने तृणमूल पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोगों ने पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद का टिकट खरीदकर चुनाव लड़ा था और अब भी उस पैसे की भरपाई नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि पंचायत व्यवस्था को लेकर बदनामी का एक कारण यह भी है कि प्रधानों के पास अत्यधिक अधिकार हैं।
विधेयक की जरूरत बताते हुए दिलीप ने कहा कि एक व्यक्ति की वजह से पंचायत का पूरा काम नहीं रुक सकता। उनके अनुसार, प्रधान केवल अनुमति देंगे, जबकि भुगतान और अन्य जरूरी दस्तावेजों पर अब पंचायत सचिव, सहायक सचिव और संबंधित अधिकारी हस्ताक्षर करेंगे।
दिलीप घोष ने कहा कि बीडीओ, एसडीओ और डीएम के हस्ताक्षर से कोई समस्या नहीं होती, लेकिन पंचायत सचिव के हस्ताक्षर को लेकर आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
पंचायत मंत्री ने आरोप लगाया कि कई मामलों में कथित कटमनी के कारण प्रधान काम के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं करते थे। उन्होंने कहा कि संशोधन का उद्देश्य इसी तरह की अनियमितताओं पर रोक लगाना है।
दिलीप घोष ने दावा किया कि देश में पंचायत प्रधानों को इस तरह की वित्तीय शक्ति केवल बंगाल में मिली हुई है और पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा के पीछे भी आर्थिक हित एक बड़ा कारण रहा है।
दिलीप घोष ने कहा कि सरकार ने पंचायतों को भंग करने का फैसला नहीं किया है। यह व्यवस्था केवल अस्थायी रूप से पंचायतों का कामकाज सुचारु रखने के लिए की गई है, ताकि आम लोगों को सरकारी सेवाएं मिलती रहें। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत पंचायतों के अधिकार नहीं छीने गए हैं, बल्कि वित्तीय लेनदेन में प्रधानों की भूमिका सीमित की गई है।
पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि सड़क निर्माण और टेंडर जैसी प्रक्रियाएं पहले की तरह चलेंगी, लेकिन कथित कटमनी की व्यवस्था नहीं चलेगी। उनके अनुसार, दस्तावेजों पर सचिव हस्ताक्षर करेंगे और प्रधान केवल अनुमति देंगे।
पंचायत मंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र से 100 दिनों के काम का पैसा फिर से आने की उम्मीद है और योजना के तहत काम भी होगा। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि इस राशि का लाभ सीधे आम लोगों तक पहुंचे, इसलिए पंचायत कानून में यह संशोधन किया गया है।
