बंगाल चुनाव: तूफान वाले तट पर 'तख्त' की जंग, क्या तृणमूल के गढ़ में खिलेगा कमल का फूल?
दक्षिण 24 परगना में चुनाव सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि आपदाओं से जूझते जीवन, विकास के दावों और सामाजिक समीकरणों का संगम है।

दक्षिण 24 परगना की चुनावी जंग। (फाइल फोटो)
HighLights
दक्षिण 24 परगना तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ बना हुआ है।
आयला, अम्फान जैसे तूफानों से क्षेत्र की नियति जुड़ी है।
विकास, भ्रष्टाचार, डायमंड हार्बर मॉडल प्रमुख चुनावी मुद्दे हैं।
जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। बंगाल की खाड़ी से सटा दक्षिण 24 परगना, एक ऐसा तटवर्ती जिला, जहां एक ओर गंगा का विस्तार और बंगाल की खाड़ी है तो दूसरी ओर सुंदरबन का मैंग्रोव जंगल। इस भूगोल की असली पहचान उसकी नियति से जुड़ी है। कभी 'आयला', कभी 'अम्फान' जैसे तूफानों का लगातार प्रहार।
यहां के लोगों की जिंदगी हर बार पटरी पर लौटने से पहले ही फिर बिखर जाती है। यहां चुनाव सिर्फ राजनीतिक ताकत का परीक्षण नहीं, बल्कि आपदा से जूझते जीवन, विकास के दावों और सामाजिक समीकरणों का संगम है। यह जिला कभी वामपंथ का अभेद्य गढ़ हुआ करता था, जहां से ज्योति बसु ने लगातार 25 वर्षों (सतगछिया विधानसभा क्षेत्र) तक प्रतिनिधित्व किया।
तृणमूल कांग्रेस का एकाधिकार
आज यहां की रंजिश और रस्म, दोनों पर 'जोड़ा फूल' (तृणमूल) का एकाधिकार है। करीब 90 लाख से अधिक आबादी और 31 विधानसभा सीटों वाला यह जिला तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। 2021 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने इसे लगभग एकतरफा बना दिया था, जहां केवल भांगड़ सीट पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के नौशाद सिद्दीकी अपवाद बने।
2021 के आंकड़ों को देखें तो 52.3 प्रतिशत वोट हासिल कर तृणमूल ने 30 सीटें जीती थीं, जबकि जिले में लगभग 31.8 प्रतिशत वोट प्राप्त कर भाजपा दूसरी सबसे बड़ी शक्ति बनी थी।
डायमंड हार्बर मॉडल बनाम विपक्षी घेराबंदी
इसी जिले का तटवर्ती डायमंड हार्बर इस पूरे परिदृश्य का केंद्र बनकर उभरा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे व टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में यहां 'डायमंड हार्बर मॉडल' की चर्चा है। कोविड के दौरान राहत वितरण से लेकर 'सेवाश्रय' (स्वास्थ्य शिविर) जैसी पहल ने स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई है।
भांगड़ का समीकरण
नौशाद और शौकत की जंगजादवपुर में वामपंथ अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है, जबकि मुस्लिम बहुल भांगड़ में नौशाद सिद्दीकी और तृणमूल के शौकत मोल्ला के बीच सीधी टक्कर है।
मुस्लिम वोट, जो जिले में 40 प्रतिशत से अधिक हैं, यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एसआइआर के बाद बड़े पैमाने पर नाम कटना भी एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरा है, क्योंकि इस जिले में भी भारी संख्या में मृत, विस्थापित और अवैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
सुंदरबन
17 साल बाद भी 'आयला' के जख्म ताजासुंदरबन के गोसाबा और बासंती जैसे इलाकों में आज भी 'आयला' के जख्म हरे हैं। 2009 में आए इस तूफान ने खेती को खारे पानी में डुबो दिया था। बांधों की जर्जर हालत, पेयजल संकट और रोजगार के अभाव ने पलायन को बढ़ाया है।
भाजपा जहां विकास की कमी और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रही है, वहीं तृणमूल केंद्र के असहयोग का हवाला देकर अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने का दावा कर रही है। जिले में करीब 35 प्रतिशत एससी-एसटी आबादी है। तटवर्ती क्षेत्र होने की वजह से मछुआरों की भी संख्या काफी है।
बेहाला से टालीगंज, साख और भ्रष्टाचार की चुनौती
उद्योग और रोजगार, जूट मिलों का बंद होना, सड़क और जलनिकासी की समस्याएं भी मतदाताओं के मन में गहरे सवाल छोड़ रही है। शिक्षा विभाग के भर्ती घोटाले में फंसे और जमानत पर मुक्त बेहाला पश्चिम के पिछली बार के विधायक व पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की इस सीट पर रत्ना चटर्जी के सामने 'भर्ती घोटाले' के दाग को धोकर विकास की छवि पेश करने की चुनौती है।
बेहाला, महेशतल्ला और बजबज जैसे शहरी इलाकों में ये मुद्दे चुनावी रुझान को प्रभावित कर सकते हैं। सोनारपुर दक्षिण में अभिनेत्री लवली मैत्र से भाजपा की रूपा गांगुली का मुकाबला है। टालीगंज, जो कोलकाता नगर निगम का हिस्सा होते हुए भी दक्षिण 24 परगना में आता है, वहां प्रत्यावर्तन होगा या परिवर्तन, यह देखना दिलचस्प होगा।
