उत्तराखंड में क्यों नहीं किया जाता गणपति जी का विसर्जन? क्या हैं धार्मिक मान्यताएं?
Uttarakhand Ganesh Visarjan: देश के कई हिस्सों में गणेश विसर्जन की धूम है, लेकिन ज्योतिषाचार्याें का कहना है कि उत्तराखंड में यह कोई पुरानी प्रथा नहीं है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
निर्मला बोहरा, उत्तराखंड। Uttarakhand Ganesh Visarjan: देश के कई इलाकों में इन दिनों गणेश उत्सव की धूम है। गणेश चतुर्थी पर गणपति की स्थापना के बाद अगले बरस आने के वादे के साथ अब उनका विसर्जन किया जा रहा है। लेकिन इन दिनाें इंटरनेट मीडिया पर गणेश विसर्जन को लेकर अनेक चर्चाएं चल रही हैं। कईयों का कहना है कि है उत्तराखंड में गणेश विसर्जन करने की प्रथा नहीं है। इसके प्रति काफी विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आइये जानते हैं क्या इसके पीछे का सच।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार उत्तराखंड में घर-घर में भगवान गणेश जी को पूजा जाता है। यहां तक कि दरवाजे के ऊपर भी गणेश जी की प्रतिमा को उकेरा जाता है। मांगलिक कार्याें में गोबर या मिट्टी से बने भगवान गणेश के प्रतिकात्मक विसर्जन की परंपरा रही है। लेकिन जिस तरह से इन दिनों गणपति विसर्जन किया जा रहा है, वैसी परंपरा उत्तराखंड में नहीं रही है।
ऐसी मान्यता है कि विसर्जन की परंपरा उन जगहों के लिए है जहां गणेश जी मेहमान या अतिथि के रूप में विराजमान किए जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड को गणेशजी की जन्मस्थली माना जाता है। इसलिए लोगों का यह मत है कि यहां विसर्जन नहीं होना चाहिए।
क्या है मान्यता?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हुआ था। समुद्रतल से 3,310 मीटर की ऊंचाई पर खूबसूरत पहाड़ों से घिरा मनमोहक डोडीताल है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसान इस ताल के पास स्थित मंदिर को भगवान गश की जन्मस्थली माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार डोडीताल में ही माता पार्वती ने स्नान करने से पहले द्वार की सुरक्षा के लिए अपने उबटन से भगवान गणेश को उत्पन्न किया था। यहां गणपति और उनकी माता पार्वती की मूर्ति विराजमान है। डोडीताल के पास बने मंदिर में मां माता की पूजा माता अन्नपूर्णा के रूप में होती हैं।

ये भी है मान्यता
देवभूमि उत्तराखंड की धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्री गणेश का विशेष स्थान है। मान्यता के अनुसार भगवान गणेश का प्राकट्य केदारखंड क्षेत्र में गौरीकुंड के निकट हुआ था, इसलिए उत्तराखंडवासी भगवान गणेश को अपने आराध्य एवं इष्ट देव के रूप में श्रद्धा से पूजते हैं।
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धार्मिक अनुष्ठानों के बाद होता है प्रतीकात्मक विसर्जन
आचार्य दिनेश प्रसाद भट्ट ने कहा कि सनातन परंपरा में देवकार्य के लिए बनाए जाने वाले मंडप, यंत्र, गोबर से निर्मित प्रतिमाएं तथा अन्य पूजन सामग्री के निर्धारित विधि-विधान के अनुसार विसर्जन की परंपरा रही है। इसी प्रकार अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में पूजन के उपरांत प्रतीकात्मक विसर्जन किया जाता है।
महाराष्ट्र एवं मुंबई जैसे समुद्र तटीय क्षेत्रों में गणेश प्रतिमा विसर्जन की एक प्रचलित परंपरा है। वहीं पर्वतीय एवं मैदानी क्षेत्रों में जलस्रोतों की प्रकृति अलग होने के कारण प्रतिमा विसर्जन के बाद पर्यावरण और धार्मिक भावनाओं से जुड़े प्रश्न भी सामने आते हैं। कई स्थानों पर विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेष दिखाई देने से श्रद्धालुओं को भी पीड़ा होती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील करते हुए कहा कि उत्तराखंड में गोबर से निर्मित श्री गणेश जी की प्रतिमा का विधिवत पूजन किया जाए और धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद शास्त्रोक्त एवं पर्यावरणसम्मत विधि से उसका विसर्जन किया जाए। इससे हमारी धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ प्रकृति और जलस्रोतों की स्वच्छता का भी संरक्षण होगा।
उद्देश्य किसी अन्य प्रदेश की परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप गणेश पूजन की परंपरा को विकसित करना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भगवान श्री गणेश की भक्ति और श्रद्धा के साथ प्रकृति के संरक्षण को भी अपनी धार्मिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनाएं।

आचार्य दिनेश भट्ट
देवभूमि में घर-घर में गणेश जी की पूजा
ज्योतिषाचार्य व कथावाचक डॉ नवीन चंद्र जोशी के अनुसार देवभूमि में घर-घर में गणेश जी को पूजा जाता है। यहां तक कि दरवाजे के ऊपर भी गणेश जी की प्रतिमा को उकेरा जाता है। देवभूमि में गणपति विसर्जन की परंपरा नहीं रही है।
यहां मांगलिक कार्यक्रमों में भी गोबर या मिट्टी के अंगूठे के आकार के गणेशजी बनाए जाते हैं और पूजन के बाद उन्हें विसर्जित किया जाता है। वैसे भी कहा गया है 'कलौ चण्डी विनायकौ' का अर्थ है कि कलियुग में मां चंडी और भगवान गणेश की पूजा-आराधना सबसे जल्दी फल देने वाली और श्रेयस्कर है।

डॉ नवीन चंद्र जोशी
बहुत प्राचीन दिखाई नहीं देती परंपरा
उत्तराखंड विद्वत सभा के प्रवक्ता आचार्य बिपिन डोभाल के अनुसार गणेश उत्सव मनाना आज अनेक स्थानों पर एक लोकप्रिय धार्मिक परंपरा के रूप में प्रचलित है। हालांकि, उत्तर भारत, विशेषकर हमारे पर्वतीय अंचल उत्तराखंड की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और लोकाचार को देखें तो गणेश उत्सव तथा गणेश विसर्जन की वर्तमान स्वरूप वाली परंपरा बहुत प्राचीन दिखाई नहीं देती।
दक्षिण भारत और महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में गणेश उत्सव की विशेष धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा रही है, जबकि उत्तर भारत में इसके स्वरूप और मान्यताएं अलग रही हैं। हमारे यहां गणेश जी की पूजा सदैव श्रद्धा और स्थायी देवता के रूप में होती आई है।
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पौराणिक परंपरा में भगवान वेदव्यास द्वारा बद्रीकाश्रम में महाभारत की रचना और भगवान गणेश द्वारा उसके लेखन से संबंधित कथा भी प्रचलित है। लोकमान्यता के अनुसार लगातार लेखन के कारण गणेश जी का मस्तिष्क गर्म हो गया, तब उन्हें शीतल जल से स्नान कराया गया। इसी प्रकार की मान्यताओं के आधार पर हमारे क्षेत्र में गणेश जी के स्नान और पूजन की परंपरा को महत्व दिया जाता रहा है।
गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के प्राकट्य उत्सव के रूप में भी माना जाता है। जिस प्रकार दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के माध्यम से माता लक्ष्मी के प्राकट्य और लक्ष्मी-नारायण से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का स्मरण किया जाता है, उसी प्रकार गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के प्राकट्य का पर्व माना जाता है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गणेश जी की एक विशिष्ट लोकपरंपरा रही है। घरों में गणेश जी को स्थायी रूप से प्रतिष्ठित कर पूजा जाता था। स्थानीय बोली में खिड़की को ‘खोली’ कहा जाता है और परंपरागत घरों में खोली के ऊपर गणेश जी की स्थापना किए जाने की मान्यता रही है। इसका भाव यही है कि भगवान गणेश घर के स्थायी मंगलकर्ता और रक्षक देवता के रूप में सदैव विराजमान रहें।
इसी दृष्टि से हमारे पर्वतीय समाज में गणेश जी का विसर्जन करने की परंपरा पारंपरिक रूप से प्रचलित नहीं रही। जब किसी देवता को स्थायी रूप से अपने घर और क्षेत्र का देवता माना जाता है, तो उसे विसर्जित करने की अपेक्षा उसकी निरंतर पूजा और सेवा की भावना अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
लोकमान्यताओं का संरक्षण जरूरी
आज उत्तराखंड में भी गणेश उत्सव और विसर्जन की परंपरा अनेक स्थानों पर दिखाई देती है। यह परंपरा पिछले कुछ दशकों में अधिक प्रचलित हुई है। हमारे बुजुर्गों की स्मृतियों और स्थानीय लोकाचार में इस प्रकार के सार्वजनिक गणेश उत्सव तथा गणेश विसर्जन का व्यापक प्रचलन पहले दिखाई नहीं देता।
अतः हमें किसी परंपरा का विरोध करने के बजाय अपनी स्थानीय धार्मिक परंपराओं, लोकाचार और शास्त्रीय विधियों को समझने का प्रयास करना चाहिए। गणेश जी विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और बुद्धि के अधिष्ठाता देवता हैं। उनकी पूजा श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान से करना ही हमारी सनातन भावना का मूल है।
हमारे लिए यह विचारणीय विषय है कि उत्तराखंड की अपनी प्राचीन देवपरंपराओं और लोकमान्यताओं का संरक्षण करते हुए आधुनिक समय में प्रचलित धार्मिक परंपराओं को किस प्रकार समझा और अपनाया जाए। धर्म का आधार केवल परंपरा नहीं, बल्कि परंपरा के पीछे निहित श्रद्धा, लोकाचार और शास्त्रीय मर्यादा को समझना भी है।
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