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गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है? जानिए वेद व्यास जी की पौराणिक कथा और 2026 का शुभ मुहूर्त

Published: Thu, 10 Sep 2026 08:06 AM (IST)

गणपति विसर्जन क्यों होता है? पढ़िए वेद व्यास और महाभारत से जुड़ी पौराणिक कथा, गणेश विसर्जन का आध्यात्मिक महत्व।

गणेश विसर्जन का आध्यात्मिक महत्व (AI-Generated Image)

गणेश विसर्जन का आध्यात्मिक महत्व (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल गणेश चतुर्थी पर बप्पा हमारे घर विराजते हैं और 10 दिनों के भक्ति भाव के बाद अनंत चतुर्दशी पर उनका विसर्जन कर दिया जाता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि ढोल-नगाड़ों के साथ बप्पा को जल में विसर्जित करने की यह परंपरा क्यों शुरू हुई? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कथा और एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।

गणेश विसर्जन 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर से शुरू होगा। वहीं, 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन किया जाएगा।

चतुर्दशी तिथि: 24 सितंबर (रात 11:18 बजे) से 25 सितंबर (रात 11:06 बजे तक)

प्रातः मुहूर्त: सुबह 6:28 बजे से 10:59 बजे तक

अपराह्न मुहूर्त (शुभ): दोपहर 12:30 बजे से 2:01 बजे तक

सायंकाल मुहूर्त: शाम 5:02 बजे से 6:32 बजे तक

महाभारत से जुड़ी है पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, जब महर्षि वेद व्यास जी को 'महाभारत' ग्रंथ की रचना करनी थी, तो उन्होंने भगवान गणेश से इसे लिखने की प्रार्थना की। गणेश जी इसके लिए तैयार तो हो गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि व्यास जी बिना रुके पूरी कथा सुनाएंगे, क्योंकि कलम एक बार चलने के बाद रुकनी नहीं चाहिए।

व्यास जी ने शर्त मान ली और कथा बोलना शुरू किया। गणेश जी लगातार 10 दिनों तक बिना विश्राम किए लिखते रहे। जब 10वें दिन महाभारत का लेखन पूरा हुआ, तो व्यास जी ने देखा कि लगातार काम करने की वजह से गणेश जी का शरीर अत्यधिक गर्म हो गया था और उनका तापमान काफी बढ़ गया था। बप्पा के शरीर को शीतलता देने और उनका तापमान सामान्य करने के लिए व्यास जी ने उन्हें पास के सरोवर में स्नान कराया। जिस दिन यह घटना हुई, उस दिन अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi 2026) थी। तभी से 10 दिनों के गणेश उत्सव के बाद विसर्जन करने की प्रथा चली आ रही है।

गणपति विसर्जन का महत्व

वहीं, आध्यात्मिक नजरिए से देखें तो मिट्टी से बनी गणपति की प्रतिमा पूजा के बाद जल में विलीन हो जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारा शरीर और यह संसार पंचतत्वों से बना है और अंत में उसी प्रकृति में मिल जाना है। ऐसी लोकमान्यता भी है कि बप्पा जाते-जाते घर-परिवार के सारे संकट और नकारात्मकता अपने साथ बहा ले जाते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।

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