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एशियन गेम्स में कपिल पोखरिया का कांस्य पदक, पिता के लिए गोल्ड, परिवार में जश्न का माहौल

Published: Wed, 30 Sep 2026 11:29 PM (IST)

जापान में एशियन गेम्स के सेमीफाइनल में हारने के बावजूद मुक्केबाज कपिल पोखरिया ने कांस्य पदक जीतकर देश और खटीमा ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, खटीमा। जापान में चल रहे एशियन गेम्स में खटीमा के चकरपुर-महतगांव निवासी मुक्केबाज कपिल पोखरिया का स्वर्ण पदक जीतने का सपना भले ही सेमीफाइनल में थम गया, लेकिन उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम कर देश के साथ सीमांत क्षेत्र का गौरव बढ़ाया है।

बुधवार को सेमीफाइनल मुकाबले में कपिल का सामना उज्बेकिस्तान के मुक्केबाज से हुआ, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बेटे की हार के बाद भी पिता नरेंद्र सिंह पोखरिया के चेहरे पर उसकी उपलब्धि का गर्व है। उन्होंने भावुक होकर कहा, बेटा यहां तक पहुंच गया, मेरे लिए तो यही गोल्ड है। अभी बहुत उम्मीदें हैं। उसका सफर यहीं खत्म नहीं हुआ है।

कपिल की इस उपलब्धि के पीछे वर्षों का संघर्ष, अनुशासन और कड़ी मेहनत है। 2018 में सेना से सेवानिवृत्त पिता नरेंद्र सिंह बताते हैं कि कपिल बचपन से ही पढ़ाई के साथ खेलकूद में आगे रहता था। छोटी उम्र में ही उसने बाक्सर बनने का सपना देख लिया था।

परिवार ने उसकी रुचि को समझा और हर कदम पर उसका हौसला बढ़ाया। गांव से निकले कपिल ने लगातार मेहनत के बूते अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी के मंच तक का सफर तय किया। कपिल ने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई शिक्षा भारती इंटर कालेज से की।

इसके बाद विवेकानंद, पुणे से बीए किया। मुक्केबाजी में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने नेशनल गेम्स में रजत पदक हासिल किया था। इसके बाद वर्ष 2019 में खेल कोटे से कुमाऊं रेजीमेंट में भर्ती हुए।

वर्तमान में वह कुमाऊं रेजीमेंट में हवलदार के पद पर कार्यरत हैं। सेना में रहते हुए उन्होंने मुक्केबाजी का अभ्यास जारी रखा और अपनी तकनीक को लगातार बेहतर किया।

मां गुड्डी की दुआ और बहन ज्योति का हौसला

कपिल की सफलता से पिता नरेंद्र सिंह पोखरिया के साथ मां गुड्डी देवी व बहन ज्योति भी भावुक और गौरवान्वित हैं। कहा परिवार के लिए कपिल का पदक केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत का फल है।

पिता का कहना है कि हार-जीत खेल का हिस्सा है। एशियन गेम्स जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करते हुए पदक तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। कांस्य पदक जीतना उनके लिए किसी स्वर्ण से कम नहीं है।

कपिल की नजर भी अब आगे के मुकाबलों पर होगी। परिवार को भरोसा है कि एशियन गेम्स का कांस्य पदक उनके सफर की मंजिल नहीं, बल्कि आने वाली बड़ी सफलताओं की शुरुआत है।

चकरपुर-महतगांव के इस मुक्केबाज कपिल पोखरिया ने साबित किया है कि छोटे से गांव से निकला खिलाड़ी भी मेहनत, अनुशासन और हौसले के दम पर दुनिया के बड़े मंच पर तिरंगा ऊंचा कर सकता है।

वर्जन

कपिल ने एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन कर कांस्य पदक जीतकर खटीमा के साथ उत्तराखंड और देश का मान बढ़ाया है। उन्हें बहुत-बहुत बधाई। सेमीफाइनल में उनका मुकाबला उज्बेकिस्तान के विश्व चैंपियन मुक्केबाज से था। हार के बावजूद कपिल ने जिस जज्बे और तकनीक के साथ मुकाबला किया, वह काबिले तारीफ है।

उत्तराखंड के इतिहास में एशियन में पदक लाने वाले कपिल चौथे बाक्सर हैं। ये सभी खिलाड़ी सेना से जुड़े हैं। कपिल ने हर स्तर पर मिले सहयोग और अपनी मेहनत को पदक में बदलकर दिखाया है। -पूरन सिंह बोरा, बेसिक कोच

कपिल का कांस्य पदक हमारे लिए गोल्ड से कम नहीं है। सीमित खेल सुविधाओं वाले पिछड़े क्षेत्र से निकलकर उसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश, प्रदेश और खटीमा का नाम रोशन किया है। उसकी यह उपलब्धि क्षेत्र के युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी।

लक्ष्मण सिंह पोखरिया, पड़ोसी

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