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उत्तराखंड में विलुप्ति की ओर हाईप्रोटीन सुपर फूड छिरबी, लद्दाख ने इस पर ब्राजील में जीता गोल्ड, पीएम भी कर चुके तारीफ

Published: Thu, 29 Oct 2026 05:18 PM (IST)

उत्तराखंड में उच्च प्रोटीन वाला पारंपरिक सुपरफूड छिरबी विलुप्ति की कगार पर है, जबकि लद्दाख की छिरबी ने ब्राजील में ...और पढ़ें

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रमेश गड़कोटी, जागरण, पिथौरागढ़। उच्च हिमालयी धारचूला की पहचान आदि कैलाश और ओम पर्वत तक ही सीमित न रहे, इसकी एक और बड़ी पहचान लौट सकती है, वह है यहां की उच्च प्रोटीन वाली चीज यानी छिरबी। कभी घर-घर में बनने वाली छिरबी अब लगभग खत्म हो गई है, जबकि भारत की इसी चीज ने हाल ही में ब्राजील में देश का नाम रोशन किया है।

इसी साल अप्रैल में ब्राजील के साओ पाउलो में हुई दुनिया की सबसे बड़ी चीज़ प्रतियोगिता में 30 देशों की 2,700 चीज़ों में लद्दाख की याक छिरबी ने गोल्ड मेडल जीता। यह छिरबी लेह के दुर्बुक के रहने वाले थेनले नुर्बू ने अपने नोर्डिक फार्म पर बनाई थी।

प्रधानमंत्री ने भी इसकी तारीफ की थी। धारचूला के व्यास, दारमा और चौंदास घाटी में रहने वाली जनजाति भी यही चीज सदियों से बनाती थी। स्थानीय भाषा में इसे छिरबी कहा जाता है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. योगेश शर्मा के मुताबिक याक के दूध में गाय के दूध से लगभग दोगुना प्रोटीन और फैट होता है।

इसे सुखाकर महीनों तक रखा जा सकता है। पुराने समय में धारचूला और मुनस्यारी के व्यापारी तिब्बत के कठिन सफर में इसे ही खाकर पोषण प्राप्त करते थे। यह हड्डियों और सर्दी से लड़ने के लिए सुपरफूड माना जाता है। यह चीज़ मुख्य रूप से याक और झोमो (याक और गाय की संकर नस्ल) के दूध से बनती है।

धारचूला में इसलिए खत्म हो गई छिरबी

20वीं पशुगणना 2019 के अनुसार पूरे भारत में सिर्फ 58,000 याक बचे हैं, जो 2012 से 24.9 प्रतिशत कम हैं। उत्तराखंड में तो इनकी संख्या 200 के आसपास ही है। पिथौरागढ़ जिले में अब 15 से 20 याक ही बचे हैं। जिनमें से अधिकांश दारमा-व्यास में हैं।

1980 के दशक में यह संख्या 2,000 से अधिक थी।पशुपालन विभाग के अनुसार पलायन, बुग्यालों का खाली होना और बाजार न मिलना इसके मुख्य कारण हैं। दारमा की बुजुर्ग महिलाएं आज भी छिरबी बनाना जानती हैं, लेकिन बताती हैं कि खरीदने वाला कोई नहीं है।

आदि कैलाश और ऊं पर्वत की तरह बन सकती है नई पहचान

यदि धारचूला में छिरबी का उत्पादन फिर शुरू हो तो यह आदि कैलाश और ओम पर्वत की तरह तीसरी पहचान बन सकती है।इससे स्थानीय लोगों को घर पर ही रोजगार मिलेगा। एक याक परिवार को साल में घी, मक्खन और छिरबी से डेढ़ लाख रुपये तक की आय दे सकता है।

महिला स्वयं सहायता समूह इसे बनाकर आदि कैलाश यात्रा मार्ग और होमस्टे पर बेच सकते हैं। लद्दाख की तरह इसे जीआई टैग भी मिल सकता है। व्यास घाटी के गुंजी गांव के रहने वाले 94 वर्षीय मंगल सिंह गुंज्याल का कहना है कि सरकार लद्दाख मॉडल पर यहां भी याक प्रजनन केंद्र, मिल्क कलेक्शन सेंटर और ट्रेनिंग की व्यवस्था करे।

याक के दूध से बननी वाली छिरबी को सुपरफूड माना जाता है। सीमांत क्षेत्र में छिरबी उत्पादन बढ़ाने के लिए स्थानीय लोगों की ओर से डिमांड आती है तो इस दिशा में प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा जायेगा।

डॉ. योगेश शर्मा, मुख्य चिकित्साधिकारी, पिथौरागढ़

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