कोटद्वार, अजय खंतवाल। वक्त सुबह करीब साढ़े सात बजे, न रेल में सवार होने का विचार था और न ही बस की सवारी करने का मन था। मन था तो उस शख्स से रूबरू होने का, जिसके नाम पर राजनीति का पूरा पहिया तो घूमता है, लेकिन वह गरीब आज भी सड़क किनारे खड़ा होकर दो जून की रोटी के जुगाड़ में रहता है। घर से उठा और टहलते हुए पहुंच गया घर से करीब डेढ़ किमी. दूर कोटद्वार के उस झंडा चौक पर, जहां सुबह एक मेला लगता है, जिसे कोटद्वार के लोग रोजगार मेला कहते हैं। उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर के विभिन्न गांवों से पहुंचे श्रमिक इस चौक के आसपास अलग-अलग जत्थे बनाकर इस उम्मीद में खड़े हो जाते हैं कि कोई आए और उन्हें अपने साथ दिहाड़ी-मजदूरी के लिए ले जाए। इन जत्थों में मौजूद प्रत्येक शख्स अपने फन का माहिर होता है। कोई बेहतर राजमिस्त्री है तो कोई अच्छा पेंटर। मजदूरी करने वालों में भी कोई अच्छा मसाला बना देता है तो कोई बिजली की तेजी से ईंट-पत्थरों के ढेर को शिफ्ट करने का माहिर। 

करीब 10 मिनट बाद जब मैं झंडा चौक पर पहुंचा तो झंडा चौक व आसपास के क्षेत्र का नजारा उम्मीद के अनुरूप ही दिखा। हाथों में छोटे-छोटे थैले पकड़े कई लोग अलग-अलग जत्थों में खड़े नजर आए। जैसे ही इनके सामने रूका, तभी नूरपुर (बिजनौर) का नाजिम मेरे पास आया और बोला, साहब घर पर रंग-रोगन करवाना है क्या? मैंने मना किया तो समीप ही खड़ा लुकादड़ी गांव का रूप सिंह बोल पड़ा, साहब घर में मरम्मत करवानी है क्या? मैंने मना किया तो रूप सिंह काम ढूंढने आगे बढ़ने लगा। मैंने ही रोका और पूछा, वोट देते हो क्या? जवाब हां में आया, लेकिन साथ ही एक सवाल भी उठा 'साहब किसानों का कर्जा माफ और मजदूर के हाथ में खाली थैला, ये कैसी व्यवस्था है?'। मैं बोला भाई सरकार तमाम योजनाएं तो चला रही है, उसका लाभ नहीं मिलता क्या? रूप सिंह जवाब देता, तभी समीप खड़े बिजौरी के दयाराम बोले 'साहब योजनाएं भले ही गरीबों के नाम पर बनें, लेकिन लाभ किसे मिलता है, यह किसी से नहीं छिपा?'। यदि गरीब को योजना का लाभ मिलता तो गरीबी कहां रहती। नजीबाबाद के पुष्कर सिंह ने दयाराम की बात पर सहमति जताई। बात आगे बढ़ती तभी निंबूचौड़ क्षेत्र से एक शख्स आए और घर की मरम्मत के नाम पर चार मजदूरों को अपने साथ ले गए और माहौल में सन्नाटा सा पसर गया। उन्हें काम पर जाते देख वहां खड़े अन्य श्रमिकों की आंखों में एक दर्द सा नजर आया। 

मैं भी थोड़ा आगे बढ़ा और चंद कदम दूर सिनेमा रोड तिराहे पर आ गया। पौने नौ बज चुके थे, लेकिन कई श्रमिक अब भी रोजगार के इंतजार में इस तिराहे पर डटे थे। चर्चा शुरू की तो गूंजेटा (बिजनौर) के मुकेश से पूछा तो बताया कि साहब मजदूरी के लिए भले ही रोज खड़े होते हैं, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि रोज मजदूरी मिले। कई बार बैरंग भी घर लौटना पड़ता है। इत्तेफाक ही कहेंगे कि जैसे ही मुकेश की बात खत्म हुई, एक शख्स आया और दस मजदूरों को साथ ले जाने की बात कह मजदूरी तय करने लगा। साढ़े तीन सौ से घटते-घटते मामला ढाई सौ में आकर टिका और दस मजदूर साथ चल दिए। मुझे भी इस बात की तसल्ली थी कि इन्हें आज का रोजगार मिल गया। 

कीमतें बढ़ी, लेकिन मजदूरी नहीं 

रोजगार की तलाश में झंडा चौक पर खड़े प्रत्येक श्रमिक का यही कहना था कि पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक चीज के दाम बढ़े, लेकिन उनकी मजदूरी पिछले कई वर्षों से नहीं बढ़ी। उन्हें इस बात की भी कोई भनक नहीं कि न्यूनतम मजदूरी अधिकार किसे कहते हैं। उन्हें तो सिर्फ यही पता है कि रोज सुबह झंडा चौक आना है और यहीं से काम पर जाना है। उनका कहना है कि पिछले पांच वर्षों में दाल-रोटी की कीमत न बढऩा उनके लिए लाभकारी रहा। 

सुरक्षा को लेकर की सराहना 

श्रमिकों ने पिछले पांच वर्षों में केंद्र की ओर से देश की सुरक्षा के लिए उठाए कदमों की सराहना की। उनका कहना था कि देश है तो हम हैं और रोजगार है। हालांकि, उन्होंने इतना अवश्य कहा कि सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गरीबों के लिए बनी योजनाओं का लाभ सिर्फ गरीबों को ही मिले। 

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Posted By: Raksha Panthari

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