उत्तराखंड में बढ़ रहा भूकंप का खतरा, भूगर्भीय गतिविधियों से सक्रिय हो रहे भूस्खलन जोन
उत्तराखंड में श्रीनगर गढ़वाल से बदरी-केदार तक भूकंप का खतरा बढ़ रहा है, जिससे भूगर्भीय दबाव के कारण भूस्खलन जोन सक्रिय हो रहे हैं।

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
श्रीनगर से बदरी-केदार तक भूगर्भीय दबाव बढ़ रहा है।
हल्के भूकंप के झटकों से भूस्खलन जोन सक्रिय हो रहे।
कमजोर ढलानों पर चट्टानों के टूटने का खतरा सर्वाधिक।
विनय बहुगुणा, श्रीनगर गढ़वाल। थोड़-थोड़े अंतराल में आ रहे भूकंप के हल्के झटके पहाड़ को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभवित कर रहे हैं। भूकंप के हल्के झटकों से भूगर्भीय गतिविधियों के तेज होने से भूस्खलन की खतरा बढ़ रहा है। भूकंप की दृष्टि से श्रीनगर से बदरी-केदार तक का पूरा क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील है।
इन क्षेत्रों में हल्के छोटे-छोटे झटकों से भूस्खलन, भूधंसाव जोन सक्रिय हो रहे हैं। भू-विज्ञानियों का कहना है कि हल्के भूकंप जमीन ऊर्जा का उत्सर्जन तो करते हैं, लेकिन इससे बड़े भूकंप से इनकार नहीं किया जा सकता है।
मंगलवार को रात्रि में 10.23 बजे आया 4.9 तीव्रता के भूकंप का केंद्र भले ही चमोली जनपद के एमसीटी में था। लेकिन, श्रीनगर गढ़वाल भी भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील जोन में चिन्हित है। यहां श्रीनगर बांध, केंद्रीय विवि का आवासीय क्षेत्र, स्वीत, सुपाणा और देवलगढ़ से होते हुए छांतीखाल तक गुजर रही थ्रस्ट से इस क्षेत्र में निरंतर भूस्खलन व भूधंसाव जोन सक्रिय है। फरासू, चमधार व सिरोहबगड़ भूस्खलन जोन के सक्रिय होने का यह प्रमुख कारण है। थोड़े-थोड़े अंतराल में दो से पांच तीव्रता वाले भूकंप से तेज होती भूगर्भीय गतिविधियों से भूस्खलन जोन सक्रिय हो रहे हैं।
कमजोर ढलानों पर चट्टानों के टूटने का खतरा
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विवि के भूगर्भ विज्ञान के विभागाध्यक्ष डाॅ. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने बताया कि हिमालय के पहाड़ में पूरे क्षेत्र में भूगर्भीय गतिविधियों की सक्रियता पर नजर रखने की जरूरत है। पर्वतीय उत्तराखंड में भूकंप का असर मैदानों से अलग है। यहां कंपन के साथ कमजोर ढलानों पर चट्टानों के टूटने का खतरा सबसे अधिक है।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सिरोहबगड़, फरासू, चमधार सहित अन्य कई भूस्खलन जोन में देखा जा सकता है, जो हल्के भूकंपीय कंपन के बाद ज्यादा संवदेनशील हो रहे हैं। इसी तरह चौरास क्षेत्र से प्रतापनगर और चमोली से बागेश्वर क्षेत्र तक थ्रस्ट गुजर रही हैं।
डाॅ. बिष्ट बताते हैं कि छोटे-छोटे भूकंप धरती के भीतर मौजूद तनाव को कम तो करते हैं। लेकिन इनका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जो कभी भी किसी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकते हैं। श्रीनगर गढ़वाल से लेकर रुद्रप्रयाग, गोपेश्वर, बदरीनाथ और केदारनाथ तक हल्के भूकंप का असर पड़ रहा है।
यहां भवनों को भूकंपरोधी बनाना ही किसी बड़े खतरे से बचना नहीं है। बल्कि पूरे क्षेत्र में संवेदनशीलता, ढलानों की निगरानी, पुराने भवनों का संरचनात्मक परीक्षण, पुलों और सड़कों की मजबूती और आपदा के बाद वैकल्पिक संपर्क मार्गों को तैयार रखना भी उतना ही जरूरी है।
पहाड़ में बड़े भूकंप
- 1991 उत्तरकाशी: करीब 6.7 तीव्रता के इस भूकंप में बड़े पैमाने पर जन-धन की क्षति हुई।
- 1999 चमोली: करीब 6.5 तीव्रता के भूकंप ने चमोली और आसपास के क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया। हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए।
- 2017 रुद्रप्रयाग: 5.8 तीव्रता के भूकंप से उत्तराखंड सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में कंपन महसूस किया गया।
- 2026 चमोली: 6 अक्टूबर की रात 4.9 तीव्रता का भूकंप 13 किमी गहराई में आया। कम गहराई के कारण झटके दूर तक महसूस हुए।
भूकंप की कम गहराई से होता ज्यादा नुकसान
भू-विज्ञानियों के अनुसार हल्का हो या तेज भूकंप में गहराई जितनी कम होगी, नुकसान उतना अधिक होगा। उत्तरकाशी व चमोली में नंबे के दशक में आए भूकंप में गहराई 12 से 13 किमी के करीब आंकी गई थी। यही कारण था कि यहां व्यापक जनहानि हुई थी। यही नहीं, बीते मंगलवार को आए भूकंप की गहराई भी 12 किमी के करीब थी, जिस कारण इसके झटके पूरे गढ़वाल में महसूस किए गए।
