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आजादी के 79 साल बाद भी पौड़ी गढ़वाल के गवाणा गांव में नहीं पहुंची सड़क, लेकिन जीवंत है लोक संस्कृति

By Vinay BahugunaEdited By: Rahul Chauhan
Published: Sun, 08 Nov 2026 03:25 PM (IST)

उत्तराखंड के गवाणा गांव में 79 साल बाद भी सड़क सुविधा नहीं पहुंची है, जिससे ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, श्रीनगर गढ़वाल। देश आजादी के 79 साल पूरे कर चुका है, लेकिन पहाड़ के कई गांव आज भी विकास की बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। कीर्तिनगर ब्लॉक की डागर पट्टी का गवाणा गांव भी इसकी मिसाल है। आज तक गांव सड़क से नहीं जुड़ पाया है।

ग्रामीणों को रोजमर्रा का सामान लाने के लिए तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। बुखार की दवा लेने के लिए भी इतनी ही दूरी तय करनी पड़ती है। बीमार और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए डंडी-कंडी का सहारा लेना पड़ता है।

सुविधाओं के अभाव में गांव पलायन की मार झेल रहा है। ग्रामीणों के कई बार के आंदोलन के बाद भी सरकारी सिस्टम की नींद नहीं टूट पाई है, जिसका खामियाजा गवाणा गांव भुगत रहा है।

लेकिन यहां रह रहे ग्रामीणों ने अपनी संस्कृति और परंपराओं को आज भी सहेजकर रखा है। दीपावली का पर्व यहां सिर्फ दीप जलाने और लक्ष्मी पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी लोक विरासत को जीवंत रखने का उत्सव भी है।

गांव में बड़ी दीपावली का विशेष महत्व है। लक्ष्मी पूजन के बाद रात को पंचायत चौक में सभी ग्रामीण एकत्रित होते हैं। ढोल-दमाऊ की थाप पर पारंपरिक दीपावली के गीत गूंजते हैं। थड्या, चौफला, चाछड़ी और झुमेलो जैसे लोकनृत्यों के जरिए ग्रामीण अपनी खुशियां साझा करते हैं।

इसके साथ ही पारंपरिक भेलो खेला जाता है। लोकगीतों और नृत्यों के बीच पूरा गांव दीपावली के उल्लास में डूब जाता है।
गांव के युवा रविंद्र नेगी बताते हैं कि सरकारों की अनदेखी के कारण गवाणा आज भी विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है।

बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ग्रामीणों को रोजाना मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद गांव में रह रहे लोगों ने अपनी लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं को खत्म नहीं होने दिया है।

गवाणा गांव की दीपावली पहाड़ की उस जीवंत सांस्कृतिक विरासत की कहानी है, जहां विकास की रोशनी भले ही अभी तक नहीं पहुंची, लेकिन परंपराओं के दीप आज भी पूरी चमक के साथ जगमगा रहे हैं।

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